नई दिल्ली
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गुरुवार को बड़ी तेजी दर्ज की गई, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नए दबाव के संकेत मिल रहे हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया, जो वर्ष 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच टकराव, तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अनिश्चितता के कारण वैश्विक आपूर्ति पर खतरा मंडराने लगा है।
इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों और तेल निर्यात पर सख्त नाकेबंदी की नीति को आगे बढ़ाना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसमें होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने की बात कही गई थी। ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिया है कि जब तक व्यापक परमाणु समझौता नहीं होता, तब तक यह प्रतिबंध जारी रहेगा। इससे वैश्विक बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।
वायदा बाजार के आंकड़ों के अनुसार जून अनुबंध के लिए ब्रेंट क्रूड 1.91 डॉलर बढ़कर 119.94 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि जुलाई अनुबंध भी 111 डॉलर के पार कारोबार कर रहा है। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 107 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है। लगातार नौ दिनों से जारी इस तेजी ने निवेशकों और तेल आयातक देशों की चिंताओं को और गहरा कर दिया है।
आपूर्ति पक्ष पर भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अपने नियंत्रण को सख्त करते हुए कई जहाजों की आवाजाही सीमित कर दी है, जबकि अमेरिका ने भी ईरानी जहाजों की नाकेबंदी तेज कर दी है। इस बीच संयुक्त अरब अमीरात का 1 मई से ओपेक और ओपेक+ गठबंधन से अलग होने का फैसला बाजार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, जिससे उत्पादन नियंत्रण की क्षमता कमजोर पड़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो कच्चे तेल की कीमतों में और अधिक अस्थिरता देखने को मिल सकती है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयातक देशों पर पड़ेगा, जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई दर में उछाल और औद्योगिक लागत में वृद्धि की आशंका है। आने वाले दिनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार पूरी तरह भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर रहेगा।


