29.3 C
Lucknow
Tuesday, July 21, 2026

क्या लोकतंत्र में असहमति की यही कीमत है?

Must read

नेता प्रतिपक्ष के साथ धक्का-मुक्की की तस्वीरों ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर खड़े किए सवाल

जवाहर सिंह गंगवार

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ रहे विपक्षी नेताओं को रोकने के दौरान सामने आईं तस्वीरें केवल एक राजनीतिक घटना नहीं हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संवेदनशीलता और उसकी संस्थागत मर्यादाओं पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करती हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पुलिस द्वारा घेरकर हिरासत में लिए जाने, उनके साथ धक्का-मुक्की और विरोध के दौरान सड़क पर बैठने-लेटने के दृश्य पूरे देश ने देखे। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को भी पुलिस ने हिरासत में लिया।

इस पूरे घटनाक्रम को केवल सत्ता और विपक्ष की टकराहट मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह लोकतंत्र में असहमति की अभिव्यक्ति, विपक्ष की भूमिका और पुलिस की कार्रवाई के बीच संतुलन का विषय भी है।

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि सत्ता में बैठी सरकार जितनी मजबूत हो, विपक्ष भी उतना ही सम्मानित और स्वतंत्र हो। संविधान ने विपक्ष को इसलिए महत्व दिया है ताकि सरकार के हर निर्णय पर सवाल उठाए जा सकें, जनता की आवाज संसद और सड़क दोनों पर पहुंच सके और लोकतांत्रिक जवाबदेही बनी रहे।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष कोई साधारण राजनीतिक पद नहीं है। यह देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के निर्वाचित नेता का संवैधानिक महत्व वाला पद है। ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति के साथ होने वाला व्यवहार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति राज्य के रवैये का भी संकेत माना जाता है।

यह भी उतना ही सत्य है कि प्रधानमंत्री आवास जैसे अति-सुरक्षित क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई प्रदर्शन निर्धारित सुरक्षा सीमाओं का उल्लंघन करता है, तो पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार और दायित्व दोनों हैं। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों का प्रयोग संयम, गरिमा और न्यूनतम बल के सिद्धांत के साथ होना चाहिए।

जब तस्वीरों में एक निर्वाचित नेता को कई पुलिसकर्मियों के बीच घिरा हुआ, खींचते या उठाकर ले जाते हुए देखा जाता है, तो बहस केवल कानून की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा की भी शुरू हो जाती है। ऐसी तस्वीरें राजनीतिक विमर्श को और अधिक तीखा बनाती हैं तथा जनता के मन में यह प्रश्न छोड़ जाती हैं कि क्या संवाद की जगह टकराव ने ले ली है?

भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति यह रही है कि यहां विरोध की आवाज को लोकतांत्रिक ढंग से अभिव्यक्त करने की परंपरा रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और अनेक जन आंदोलनों तक—असहमति ने ही लोकतंत्र को मजबूत किया है। विरोध लोकतंत्र का दुश्मन नहीं, बल्कि उसका आवश्यक तत्व है।

इसी प्रकार विपक्ष की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। विरोध यदि शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में हो तो उसकी नैतिक शक्ति कहीं अधिक होती है। सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन करना सभी राजनीतिक दलों का दायित्व है। लोकतंत्र में अधिकार और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ चलते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखें। पुलिस निष्पक्ष और संयमित रहे, सरकार संवाद का रास्ता चुने और विपक्ष भी संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर अपनी बात रखे। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
यह घटना कुछ घंटों की राजनीतिक हलचल भर नहीं है। यह भविष्य के लिए एक संदेश भी है। आज यदि किसी एक दल का नेता ऐसी स्थिति में है, तो कल सत्ता परिवर्तन के बाद यही परिस्थिति किसी दूसरे दल के सामने भी आ सकती है। इसलिए लोकतांत्रिक संस्थाओं और पदों का सम्मान किसी व्यक्ति या दल के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
लोकतंत्र की असली शक्ति विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनने, सहने और संविधान के दायरे में उसका सम्मान करने में है। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाएं स्थायी रहनी चाहिए। यही भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article