– ई-रिक्शा मरम्मत में 64,720,
– टेबल-अलमारी पर 59,767
– यूपीवीसी विंडो पर 37,300 रुपये का भुगतान दर्ज
मोहम्मदाबाद, फर्रुखाबाद । ग्राम पंचायत पिपरगांव में सरकारी धन खर्च करने के मामले मे गोलमाल के आरोपों बाद शिकायत हुईं है,जिसने पंचायत की खरीद और भुगतान व्यवस्था पर सबाल दागे हैं।
सरकारी अभिलेखों में स्मार्ट बोर्ड 1,44,999 रुपये, ई-रिक्शा मरम्मत 64,720 रुपये और टेबल-अलमारी 59,767 रुपये में खरीदे जाने का भुगतान दर्ज है। सफाई कर्मियों की किट, यूपीवीसी विंडो, मलबा ढुलाई, जेसीबी, ट्रैक्टर भाड़ा और मरम्मत के नाम पर भी रकम खर्च हुई है। भुगतानों में निर्धारित नियमों और बाजार दरों मे भारी अंतर ने हंगामा खड़ा कर दिया।
स्मार्ट बोर्ड से ई-रिक्शा तक खर्च की लंबी फेहरिस्त
सरकारी अभिलेखों में दर्ज भुगतानों के अनुसार ई-रिक्शा की मरम्मत पर 64,720 रुपये खर्च हुए। अलमारी और टेबल के लिए 59,767 रुपये, यूपीवीसी विंडो के लिए 37,300 रुपये और सफाई कर्मी की किट के लिए 24,250 रुपये का भुगतान दर्ज है। वहीं स्मार्ट बोर्ड की खरीद के नाम पर 1,44,999 रुपये खर्च किए गए हैं।
आरोप है कि कई सामान बाजार की सामान्य कीमतों की तुलना में काफी अधिक दर पर खरीदे गए। हालांकि इन दरों की वास्तविकता और खरीद प्रक्रिया की वैधता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
पंचायत के खर्चों में पानी भराव वाले स्थानों पर राविस और टुकड़ा डालने, हैंडपंप मरम्मत, स्टेशनरी, जेसीबी कार्य, कंप्यूटर मरम्मत, कीचड़ हटाने और मलबा ढोने के लिए ट्रैक्टर भाड़े सहित कई मद बताए जा रहे हैं। मलबा ढुलाई के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का भी दावा है। ऐसे में सवाल है कि वास्तव में कितना मलबा हटाया गया, कितने चक्कर ट्रैक्टर ने लगाए और इसके लिए किस आधार पर भुगतान तय किया गया।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पंचायत में कुछ कार्य कागजों पर दिखाकर भुगतान निकाला गया, जबकि मौके पर कार्य की स्थिति अलग है। सफाई और मरम्मत के नाम पर भी भुगतान जाँच का विषय हैं। प्रत्येक भुगतान की पत्रावली, बिल-वाउचर और मौके पर हुए कार्य का भौतिक सत्यापन होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज रकम के बदले वास्तव में कितना काम हुआ।
ग्राम पंचायत में हो रहे भुगतान को लेकर ग्राम प्रधान कुंतेश यादव और सचिव राजीव गौतम की भूमिका संदिग्ध हैं। शिकायत में दोनों पर मिलीभगत से सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में जांच में बिल, वाउचर, कोटेशन, टेंडर प्रक्रिया, कार्यादेश, भुगतान अभिलेख और मौके पर हुए कार्य का मिलान महत्वपूर्ण होगा।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि सचिव स्वयं को जिला विकास अधिकारी का करीबी बताते हैं, जबकि ग्राम प्रधान के राजनीतिक संबंधों को लेकर भी चर्चाएं हैं। हालांकि इन दावों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। सवाल यही है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो बिल-वाउचर और भुगतान पत्रावलियों की निष्पक्ष जांच से स्थिति खुद साफ क्यों न हो जाए।
मामले को लेकर जिला पंचायत राज अधिकारी अविनाश चौरसिया से बात की गई तो उन्होंने कहा कि सभी बिल-वाउचर और संबंधित पत्रावलियों की जांच कराई जाएगी तथा जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर उचित कार्रवाई की जाएगी।


