32 C
Lucknow
Saturday, September 12, 2026

भारत, रूस और चीन साथ आए तो बदल सकता है वैश्विक शक्ति संतुलन

Must read

 

– भारत ने साफ किया रुख,ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी मंच नहीं
– बल्कि गैर-पश्चिमी देशों के सहयोग का मंच
– ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने भी किया समर्थन
शरद कटियार
नई दिल्ली । दुनिया की बदलती भू-राजनीति के बीच ब्रिक्स अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। भारत, रूस और चीन जैसे बड़े देशों की मौजूदगी ने इसे वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में प्रभावशाली समूह बना दिया है। ऐसे में यह सवाल लगातार चर्चा में है कि यदि भारत, रूस और चीन अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को लेकर एकजुट होकर आगे बढ़ते हैं तो वैश्विक शक्ति संतुलन पर इसका कितना बड़ा असर पड़ सकता है।
ब्रिक्स की ताकत का आधार केवल सदस्य देशों की संख्या नहीं, बल्कि उनका विशाल बाजार, प्राकृतिक संसाधन, उत्पादन क्षमता और बढ़ती आर्थिक भूमिका है। भारत और चीन दुनिया की बड़ी आबादी वाले देश हैं, जबकि रूस ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। तीनों देशों के बीच यदि व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, भुगतान व्यवस्था और निवेश के क्षेत्र में सहयोग और मजबूत होता है तो इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
ब्रिक्स के भीतर भारत ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक रुख अपनाया है। भारत का कहना है कि ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी संगठन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे गैर-पश्चिमी देशों के सहयोग के मंच के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए। यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देती रही है। वह एक तरफ अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अपने आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं रूस और अन्य देशों के साथ भी अपने पारंपरिक संबंध बनाए हुए है। इसलिए भारत के लिए ब्रिक्स का उद्देश्य किसी एक शक्ति के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में विकासशील और गैर-पश्चिमी देशों की आवाज को मजबूत करना है।
बताया जा रहा है कि भारत के इस दृष्टिकोण को ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिक्स सदस्य देशों का भी समर्थन मिला है। इससे यह संकेत मिलता है कि समूह के भीतर पश्चिमी देशों के खिलाफ सीधे टकराव के बजाय बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को लेकर सहमति अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि भारत, रूस और चीन आर्थिक मोर्चे पर अधिक समन्वय स्थापित करते हैं तो इसके कई स्तरों पर प्रभाव देखने को मिल सकता है। ऊर्जा के क्षेत्र में रूस की भूमिका, चीन की विनिर्माण क्षमता और भारत का विशाल बाजार तथा तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।
व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में बढ़ाने, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने और आपूर्ति शृंखलाओं में सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी संभावनाएं हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में केवल एक मुद्रा या कुछ पश्चिमी वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता घटाने की बहस को बल मिल सकता है।
हालांकि इसे आसान गठजोड़ मानना भी सही नहीं होगा। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस के पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में तनाव है और भारत के अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के साथ भी गहरे आर्थिक एवं रणनीतिक रिश्ते हैं। इसलिए ब्रिक्स के भीतर सहयोग का अर्थ यह नहीं है कि सदस्य देश अपने दूसरे वैश्विक साझेदारों से दूरी बना लेंगे।
ब्रिक्स यदि आर्थिक सहयोग को और मजबूत करता है तो वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधन, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों जैसे मुद्दों पर इसका प्रभाव बढ़ सकता है।
सबसे बड़ा बदलाव बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में हो सकता है। यानी दुनिया में निर्णय लेने की शक्ति कुछ चुनिंदा पश्चिमी शक्तियों तक सीमित रहने के बजाय कई आर्थिक और राजनीतिक केंद्रों में बंट सकती है।
लेकिन यह भी समझना होगा कि ब्रिक्स कोई एकीकृत सैन्य गठबंधन या एकल राजनीतिक संगठन नहीं है। इसके सदस्य देशों के हित कई मुद्दों पर अलग-अलग हैं। इसलिए इसकी असली ताकत तभी सामने आएगी जब सदस्य देश अपने मतभेदों के बावजूद आर्थिक और विकास संबंधी साझा मुद्दों पर व्यावहारिक सहयोग बढ़ा पाएंगे।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article