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Saturday, June 13, 2026

सत्ता नहीं, विचार सबसे बड़ा: चंद्रशेखर से अमित शाह तक राजनीतिक प्रतिबद्धता की परंपरा

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प्रो. एच. एन. शर्मा

भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में जब दल-बदल, अवसरवाद और सत्ता की राजनीति आम होती जा रही है, तब उन नेताओं और संगठनों की चर्चा अधिक प्रासंगिक हो जाती है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने विचार, संगठन और राजनीतिक विश्वास का साथ नहीं छोड़ा। राजनीति में विचारधारा और सत्ता के बीच चलने वाले इस संघर्ष को समझने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री चंद्र शेखर , केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे उदाहरणों को देखा जा सकता है।

चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने सत्ता से अधिक अपने राजनीतिक आत्मसम्मान और वैचारिक स्वतंत्रता को महत्व दिया। आपातकाल के दौरान जब विरोध की आवाज़ों को दबाया जा रहा था, तब उन्होंने सत्ता के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। जेल गए, राजनीतिक नुकसान उठाया, लेकिन अपने विचारों का परित्याग नहीं किया। यही कारण है कि आज भी उन्हें सिद्धांतवादी राजनीति का प्रतीक माना जाता है।

इसी प्रकार अमित शाह का राजनीतिक जीवन भी संघर्ष और संगठन के प्रति निष्ठा का उदाहरण माना जाता है। वर्ष 2010 से 2014 के बीच वे गंभीर कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे थे। विरोधी दल लगातार उन पर हमलावर थे। उस समय उनके सामने कई रास्ते थे। वे राजनीतिक समझौते कर सकते थे, पार्टी बदल सकते थे या अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कोई दूसरा विकल्प चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि उस दौर में अमित शाह केवल व्यक्तिगत सुरक्षा और राजनीतिक सुविधा को प्राथमिकता देते तो उनके लिए दूसरे विकल्प उपलब्ध थे। किंतु उन्होंने संगठन नहीं छोड़ा और भाजपा के साथ खड़े रहे। कई महीनों तक राजनीतिक अनिश्चितता झेली, सार्वजनिक आलोचनाओं का सामना किया और कठिन परिस्थितियों में भी अपने राजनीतिक विश्वास से पीछे नहीं हटे। बाद में वही नेता देश के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में शामिल हुए और भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व विस्तार दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

समर्थकों का मानना है कि अमित शाह की सबसे बड़ी ताकत उनका संगठन के प्रति समर्पण रहा। भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम दिखाई देते हैं जब कोई नेता कठिन समय में भी अपने संगठन के साथ खड़ा रहे और बेहतर अवसर मिलने के बावजूद रास्ता न बदले। यही कारण है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच अमित शाह को केवल नेता नहीं बल्कि संगठन निर्माता के रूप में भी देखा जाता है।

राजनीति में विचारधारा की इस चर्चा के बीच आरएसएस का उल्लेख भी महत्वपूर्ण हो जाता है। संघ लगभग एक शताब्दी से अधिक समय से सक्रिय है। उसके समर्थकों का मानना है कि सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं, लेकिन समाज को संगठित रखने वाले संस्थान स्थायी भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि अक्सर कहा जाता है कि यदि देश किसी बड़े संकट का सामना करता है तो संगठित सामाजिक शक्ति सबसे पहले सामने आती है।

संघ के स्वयंसेवकों ने विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक संकटों और राहत कार्यों में भाग लिया है। समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्र केवल संसद, मंत्रालय और सरकारों से नहीं चलता, बल्कि समाज की संगठित चेतना से भी चलता है। इसी सोच ने संघ को लंबे समय तक सक्रिय बनाए रखा है।

इसके विपरीत आज राजनीति में बड़ी संख्या में ऐसे नेता दिखाई देते हैं जिनकी प्राथमिकता विचारधारा नहीं बल्कि सत्ता होती है। चुनावी टिकट, मंत्री पद या राजनीतिक लाभ के अनुसार दल बदलना सामान्य बात बन चुकी है। कई नेता सत्ता बदलते ही अपने राजनीतिक विचार भी बदल लेते हैं। यही कारण है कि जनता के बीच राजनीतिक विश्वसनीयता का संकट बढ़ रहा है।

कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इंडियन नेशनल कांग्रेस समेत कई दलों की कमजोरी का एक कारण वैचारिक कार्यकर्ताओं का लगातार कम होना भी है। जब संगठन संघर्षशील कार्यकर्ताओं के बजाय केवल चुनावी नेताओं पर निर्भर होने लगता है, तब उसकी जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की मजबूती के पीछे उसके समर्थक लंबे वैचारिक प्रशिक्षण, संगठनात्मक अनुशासन और समर्पित कार्यकर्ता तंत्र को प्रमुख कारण बताते हैं।

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन विचार स्थायी होते हैं। चंद्रशेखर का संघर्ष, अमित शाह का कठिन दौर में संगठन के साथ खड़ा रहना और आरएसएस की दीर्घकालिक संगठनात्मक यात्रा इस बात का उदाहरण मानी जाती है कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि विश्वास, विचार और प्रतिबद्धता का भी क्षेत्र है।

आज जब राजनीति का बड़ा हिस्सा तात्कालिक लाभ और सत्ता के गणित के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है, तब ऐसे उदाहरण यह संदेश देते हैं कि राष्ट्र निर्माण में वही लोग और संगठन लंबे समय तक प्रभाव छोड़ते हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और प्रतिबद्धताओं को नहीं छोड़ते। सत्ता बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन विचारधारा और संगठन के प्रति समर्पण ही किसी राजनीतिक विरासत को स्थायी बनाता है।
लेखक पूर्व पीएम चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।

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