– डीआईजी पर जानलेवा हमले में 16 दोषी करार; अफवाह से भड़की थी आग, थाने फूंके, पुलिस बेबस हुई थी
मुरादाबाद। बहुचर्चित और सनसनीखेज मैनाठेर कांड में आखिरकार 15 साल बाद न्याय का पहिया घूमता नजर आया है। एडीजे-2 अदालत ने तत्कालीन डीआईजी पर हुए जानलेवा हमले समेत हिंसा के इस बड़े मामले में 16 आरोपियों को दोषी करार दिया है। चार आरोपी सुनवाई के दौरान ही मौत के मुंह में जा चुके हैं, जबकि बाकी दोषियों की सजा का ऐलान 27 मार्च को किया जाएगा। यह फैसला न सिर्फ कानून व्यवस्था पर हमला करने वालों के लिए सख्त संदेश है, बल्कि उस काले दिन की भयावह तस्वीर भी एक बार फिर सामने ले आया है।
पूरा मामला 6 जुलाई 2011 की सुबह शुरू हुआ, जब पुलिस एक आरोपी की तलाश में असालतनगर बघा गांव में दबिश देने पहुंची थी। दबिश के बाद फैली अफवाह ने देखते ही देखते विकराल रूप ले लिया। परिवार की ओर से महिलाओं से अभद्रता और धार्मिक अपमान के आरोप लगाए गए, जिसने माहौल को भड़काने का काम किया। कुछ ही घंटों में यह खबर आग की तरह फैल गई और आसपास के जिलों से भीड़ उमड़ पड़ी। हालात इतने बेकाबू हो गए कि प्रशासन की शुरुआती कोशिशें नाकाफी साबित हुईं।
उग्र भीड़ ने कानून को खुलेआम चुनौती देते हुए मैनाठेर थाने और डींगरपुर पुलिस चौकी को आग के हवाले कर दिया। पुलिस के वाहन फूंक दिए गए, सरकारी संपत्ति को तहस-नहस कर दिया गया और हद तो तब हो गई जब पुलिसकर्मियों से उनके हथियार तक छीन लिए गए। करीब 10 घंटे तक पूरा इलाका हिंसा की जद में रहा, जहां कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नजर नहीं आ रही थी।
स्थिति संभालने पहुंचे तत्कालीन डीआईजी अशोक कुमार सिंह पर भीड़ का गुस्सा इस कदर टूटा कि उन्हें अपनी जान बचाने के लिए पेट्रोल पंप के टॉयलेट में छिपना पड़ा। लेकिन बेकाबू भीड़ वहां भी पहुंच गई, दरवाजा तोड़ दिया और उन पर बेरहमी से हमला किया। उनकी पिस्टल तक छीन ली गई। इस हमले में अशोक कुमार सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए—सिर पर गहरी चोटें आईं, उंगलियां टूट गईं और लंबे समय तक उन्हें अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा।
इस हिंसक बवाल में डीआईजी समेत 20 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए थे। हालात इतने खराब हो गए थे कि प्रदेश स्तर से भारी पुलिस बल और वरिष्ठ अधिकारियों को मौके पर भेजना पड़ा। तब जाकर कहीं हालात काबू में आए। इस घटना ने पुलिस तंत्र की कमजोरियों और भीड़तंत्र के खतरनाक रूप को उजागर कर दिया था।
मामले की जांच के दौरान 50 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए, कई मुकदमे कायम हुए और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब जाकर यह फैसला सामने आया है। इस बीच, घटना ने सियासी रंग भी लिया था और कई बड़े नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। क्षेत्र में कई दिनों तक तनाव बना रहा और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे।
यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो अफवाहों के आधार पर कानून को हाथ में लेने की कोशिश करते हैं। मैनाठेर कांड सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि यह उस मानसिकता का उदाहरण था जहां भीड़ न्याय अपने हाथ में लेने लगती है। अदालत का यह निर्णय ऐसे तत्वों पर सख्ती की जरूरत को रेखांकित करता है।
आज, डेढ़ दशक बाद भी मैनाठेर कांड की भयावहता लोगों के जेहन में जिंदा है। यह मामला याद दिलाता है कि अफवाह, उन्माद और भीड़ का मेल कितना खतरनाक हो सकता है—और यह भी कि कानून का शिकंजा चाहे देर से ही सही, लेकिन कसता जरूर है।


