– चुनाव आयोग से पूछा- लोकतंत्र को इंतजार क्यों?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद चुनाव कार्यक्रम घोषित न होने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए निर्वाचन आयोग से स्पष्ट जवाब मांगा है कि आखिर प्रदेश में पंचायत चुनाव कब कराए जाएंगे।
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह संकेत दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर लंबे समय तक अंतरिम व्यवस्था या कार्यकाल विस्तार संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा मौजूदा ग्राम प्रधानों का कार्यकाल छह महीने तक बढ़ाने के निर्णय पर भी असंतोष जताया और कहा कि चुनाव कराना निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है, जिसे अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य निर्वाचन आयोग से चुनावी तैयारियों, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और आरक्षण प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत जानकारी मांगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पंचायतों जैसी जमीनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को लंबे समय तक अस्थायी व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर पहले से ही राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि चुनाव टालने की कोशिश की जा रही है, जबकि सरकार का पक्ष है कि आरक्षण निर्धारण और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते चुनाव कार्यक्रम में विलंब हुआ है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद अब राज्य निर्वाचन आयोग पर चुनाव की तारीखों को लेकर स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करने का दबाव बढ़ गया है। अगली सुनवाई में आयोग को अदालत के समक्ष यह बताना होगा कि प्रदेश की करोड़ों ग्रामीण आबादी अपने नए पंचायत प्रतिनिधियों का चुनाव कब करेगी।
पंचायत चुनाव केवल ग्राम प्रधान चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि यह गांवों के विकास, स्थानीय प्रशासन और लोकतांत्रिक भागीदारी की सबसे मजबूत कड़ी माने जाते हैं। ऐसे में हाईकोर्ट की टिप्पणी ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक तंत्र में नई हलचल पैदा कर दी है। अब सबकी निगाहें आयोग के अगले जवाब और संभावित चुनाव कार्यक्रम पर टिकी हैं।


