शरद कटियार
शहरों में सार्वजनिक परिवहन की कमी को पूरा करने वाले ई-रिक्शा आज आम आदमी की आवाजाही का महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। छोटी दूरी के सफर के लिए इनकी उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इनकी लगातार बढ़ती संख्या और संचालन में नियमों की अनदेखी ने यातायात व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। यही वजह है कि ई-रिक्शा के अनियंत्रित संचालन को लेकर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद शासन-प्रशासन को अब व्यवस्था में बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाने पड़ रहे हैं।
ई-रिक्शा की सबसे बड़ी समस्या केवल उनकी संख्या नहीं, बल्कि उनका संचालन किस मार्ग पर और किस तरीके से हो रहा है, यह भी है। शहरों के प्रमुख और पहले से व्यस्त मार्गों पर बड़ी संख्या में ई-रिक्शा पहुंचने से यातायात की रफ्तार प्रभावित होती है। कई स्थानों पर सड़क किनारे खड़े होकर सवारियां भरना, अचानक दिशा बदलना और प्रतिबंधित मार्गों पर संचालन जैसी शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। इसका सीधा असर आम वाहन चालकों, पैदल यात्रियों और सार्वजनिक परिवहन पर पड़ता है।
यहां सवाल यह भी है कि जिस साधन को गरीब और मध्यम वर्ग के लिए सस्ता तथा सुलभ परिवहन माना गया, उसे अचानक समस्या के रूप में देखने की नौबत क्यों आई। दरअसल, समस्या ई-रिक्शा के अस्तित्व में नहीं, बल्कि बिना समुचित यातायात योजना के बढ़ते संचालन में है। यदि शहर की आबादी, सड़क की क्षमता, यात्रियों की जरूरत और प्रमुख मार्गों को ध्यान में रखकर संख्या तय की जाए तो ई-रिक्शा यातायात व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं, बोझ नहीं।
ई-रिक्शा के संचालन को नियंत्रित करने में परिवहन विभाग के सामने एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती यह है कि इन्हें परमिट व्यवस्था से छूट मिली हुई है। ऐसे में केवल स्थानीय स्तर पर कार्रवाई करके इनकी संख्या और संचालन को स्थायी रूप से नियंत्रित करना आसान नहीं है। इसी कारण परिवहन विभाग की ओर से केंद्र सरकार से तकनीकी सहयोग लेने तथा मोटरयान अधिनियम की धारा 65 में संशोधन की सिफारिश किए जाने की बात सामने आई है।
यह कदम बताता है कि समस्या अब केवल यातायात पुलिस के चालान या अभियान तक सीमित नहीं रह गई है। यदि बड़े शहरों में ई-रिक्शा की संख्या लगातार बढ़ती रहती है तो उनके पंजीकरण, बिक्री, संचालन क्षेत्र और मार्गों को लेकर स्पष्ट नीति बनाना जरूरी होगा। शहर के हिसाब से अधिकतम संख्या निर्धारित करने तथा भीड़भाड़ वाले मार्गों पर संचालन को सीमित करने जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
राजधानी लखनऊ में प्रतिबंधित मार्गों पर ई-रिक्शा के संचालन को लेकर परिवहन विभाग और पुलिस प्रशासन के बीच संयुक्त अभियान की तैयारी की जा रही है। परिवहन आयुक्त की ओर से इस संबंध में लखनऊ पुलिस आयुक्त को पत्र भेजे जाने के बाद कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है। आने वाले दिनों में प्रतिबंधित मार्गों पर चलने वाले ई-रिक्शा के खिलाफ अभियान दिखाई दे सकता है।
हालांकि प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि कार्रवाई केवल कुछ दिनों का अभियान बनकर न रह जाए। अक्सर यातायात सुधार के लिए अभियान शुरू होते हैं, कुछ समय तक सख्ती दिखाई देती है और फिर पुरानी स्थिति लौट आती है। ई-रिक्शा के मामले में भी स्थायी समाधान के लिए नियमित निगरानी, स्पष्ट मार्ग निर्धारण और नियमों का समान रूप से पालन जरूरी होगा।
ई-रिक्शा केवल यातायात का साधन नहीं हैं, बल्कि बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका भी इनसे जुड़ी है। इसलिए इनके संचालन को पूरी तरह रोकना न तो व्यावहारिक समाधान होगा और न ही सामाजिक रूप से उचित। जरूरत इस बात की है कि चालक, यात्री और शहर की यातायात व्यवस्था—तीनों के हितों के बीच संतुलन बनाया जाए।
प्रशासन को चाहिए कि कार्रवाई से पहले स्पष्ट रूप से तय करे कि कौन से मार्ग ई-रिक्शा के लिए उपयुक्त हैं, किन मार्गों पर इनका संचालन प्रतिबंधित रहेगा और किन क्षेत्रों में इनकी संख्या सीमित की जाएगी। साथ ही वैकल्पिक मार्ग और सवारी चढ़ाने-उतारने के निर्धारित स्थान विकसित किए जाएं, ताकि चालक सड़क के बीच या प्रमुख चौराहों के आसपास वाहन खड़ा करके जाम की स्थिति पैदा न करें।
सिर्फ ई-रिक्शा को दोष देना समाधान नहीं
शहरों के यातायात संकट के लिए केवल ई-रिक्शा को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं होगा। अवैध पार्किंग, अतिक्रमण, सड़क की कम चौड़ाई, ठेले-खोमचे, निजी वाहनों की बढ़ती संख्या और सार्वजनिक परिवहन की सीमित उपलब्धता भी जाम के बड़े कारण हैं। इसलिए ई-रिक्शा पर कार्रवाई के साथ इन समस्याओं पर भी समान गंभीरता से काम करना होगा।
हाईकोर्ट की सख्ती को इस पूरे मामले में एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि सरकार और स्थानीय प्रशासन केवल चालान काटने तक सीमित रहने के बजाय डेटा आधारित यातायात नीति तैयार करते हैं तो इसका दूरगामी लाभ मिल सकता है। प्रत्येक बड़े शहर में सड़क क्षमता के अनुरूप ई-रिक्शा की संख्या, निर्धारित रूट, संचालन समय और स्टैंड तय किए जा सकते हैं।
ई-रिक्शा गरीब और मध्यम वर्ग के लिए सुलभ परिवहन का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसलिए नीति ऐसी होनी चाहिए जिसमें न तो यात्रियों की सुविधा छीने और न चालकों की रोजी-रोटी पर अनावश्यक संकट आए, लेकिन शहर की सड़कों को भी अनियंत्रित संचालन के हवाले न किया जाए। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार के सामने अब असली परीक्षा यही है कि वह तात्कालिक अभियान से आगे बढ़कर ई-रिक्शा के लिए ऐसी स्थायी व्यवस्था बनाए, जिसमें सुविधा भी हो, रोजगार भी बचे और शहर का यातायात भी सुचारु रहे।


