शरद कटियार
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान कि “कश्मीर में आतंकवाद को पूरी तरह कुचल दिया गया है” केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं है, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, जम्मू-कश्मीर की बदलती परिस्थितियों और आतंकवाद के विरुद्ध दशकों से चल रही लड़ाई के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण दावा भी है। यह बयान उस दौर में आया है जब देश आतंकवाद के प्रति “जीरो टॉलरेंस” की नीति को अपनी सुरक्षा रणनीति का प्रमुख आधार मान रहा है।
करीब तीन दशकों तक जम्मू-कश्मीर आतंकवाद, अलगाववाद और सीमा पार से प्रायोजित हिंसा का केंद्र बना रहा। हजारों नागरिक, सुरक्षाकर्मी और जनप्रतिनिधि इस संघर्ष में अपनी जान गंवा चुके हैं। पर्यटन, शिक्षा, व्यापार और सामान्य जनजीवन पर इसका गहरा असर पड़ा। कश्मीर की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता से अधिक आतंकवाद की खबरों से जुड़ने लगी थी, जो देश के लिए चिंता का विषय रही।
पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने आतंकवादी संगठनों के खिलाफ लगातार अभियान चलाए हैं। सीमा पर निगरानी बढ़ाई गई, आधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया, आतंकी वित्तपोषण पर कार्रवाई हुई और स्थानीय स्तर पर सक्रिय नेटवर्क को कमजोर करने के प्रयास किए गए। कई बड़े आतंकवादी मारे गए, हथियारों की बरामदगी हुई और घुसपैठ की अनेक कोशिशें विफल की गईं। इन अभियानों में सेना, अर्धसैनिक बलों, जम्मू-कश्मीर पुलिस और खुफिया एजेंसियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक व्यवस्था में भी बड़े बदलाव हुए। सरकार का दावा है कि इससे विकास परियोजनाओं को गति मिली, निवेश का माहौल बेहतर हुआ, पर्यटन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर बने। घाटी में सड़क, रेल, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसी परियोजनाओं पर भी तेजी से काम हुआ है। अमरनाथ यात्रा और पर्यटन सीजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों का पहुंचना भी सामान्य स्थिति की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखा जाता है।
लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि समय-समय पर सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ों, घुसपैठ की कोशिशों तथा लक्षित हमलों की खबरें सामने आती रही हैं। इसका अर्थ यह है कि आतंकवाद की चुनौती पूरी तरह समाप्त हुई है या नहीं, इसका अंतिम आकलन सुरक्षा एजेंसियों और जमीनी हालात के आधार पर ही किया जा सकता है। सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आतंकवाद के विरुद्ध सफलता केवल आतंकियों के मारे जाने से नहीं, बल्कि उनके नेटवर्क, वित्तीय स्रोत, वैचारिक प्रभाव और भर्ती तंत्र के पूरी तरह खत्म होने से मानी जाती है।
यह भी समझना होगा कि आतंकवाद केवल बंदूक का नहीं, बल्कि विचारधारा का भी संघर्ष है। यदि युवा शिक्षा, रोजगार और विकास की मुख्यधारा से जुड़ते हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास बढ़ता है और समाज में शांति का वातावरण बनता है, तभी आतंकवाद की जड़ें वास्तव में कमजोर होती हैं। इसलिए सुरक्षा अभियान के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण भी उतना ही आवश्यक है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान सरकार के आत्मविश्वास को दर्शाता है। यह संदेश भी देता है कि भारत अब आतंकवाद के प्रति किसी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगा। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर उपलब्धियों का मूल्यांकन हमेशा तथ्यों, सुरक्षा एजेंसियों के आकलन और दीर्घकालिक परिणामों के आधार पर किया जाता है।
भारत की सबसे बड़ी सफलता तब मानी जाएगी, जब कश्मीर की पहचान हमेशा के लिए आतंकवाद नहीं, बल्कि शिक्षा, पर्यटन, संस्कृति, निवेश, रोजगार और शांति से होगी।
जब घाटी का हर युवा विकास का भागीदार बनेगा, हर परिवार भयमुक्त जीवन जी सकेगा और सीमाओं के भीतर स्थायी शांति स्थापित होगी, तभी आतंकवाद पर निर्णायक विजय का दावा पूर्ण अर्थों में साकार माना जाएगा। राष्ट्र की सुरक्षा के साथ-साथ विश्वास, विकास और लोकतंत्र का संतुलन ही कश्मीर के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।


