डॉ. विजय गर्ग
पेड़ लगाना आमतौर पर पर्यावरण की रक्षा के सबसे अच्छे उपायों में माना जाता है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, जीव-जंतुओं को आवास देते हैं, मिट्टी की रक्षा करते हैं और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करते हैं। लेकिन उरुग्वे में किए गए एक दीर्घकालिक वैज्ञानिक अध्ययन से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—पेड़ कहाँ लगाए जा रहे हैं और कौन-सी प्रजातियाँ लगाई जा रही हैं, यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि कितने पेड़ लगाए जा रहे हैं।
पिछले कुछ दशकों में उरुग्वे के प्राकृतिक घासभूमि क्षेत्रों के बड़े हिस्से को व्यावसायिक वृक्षारोपण में बदला गया है। इनमें विशेष रूप से पाइन और यूकेलिप्टस के पेड़ लगाए गए। वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि इस बदलाव का नदियों और जलधाराओं में उपलब्ध पानी पर क्या प्रभाव पड़ता है।
एक महत्वपूर्ण प्रयोग में उत्तरी उरुग्वे के दो पड़ोसी जलग्रहण क्षेत्रों की तुलना की गई। दोनों क्षेत्र मूल रूप से घासभूमि थे। वर्ष 2003 में इनमें से एक क्षेत्र में लॉब्लॉली पाइन लगाए गए, जबकि दूसरा क्षेत्र चरागाह के रूप में बना रहा। शोधकर्ताओं ने लगभग 20 वर्षों तक वर्षा, भूजल स्तर और जलग्रहण क्षेत्रों से बाहर निकलने वाले पानी की लगातार निगरानी की।
परिणाम काफी महत्वपूर्ण थे। पेड़ लगाए जाने के बाद 17 वर्षों की अवधि में पाइन वाले क्षेत्र से प्राप्त कुल जल प्रवाह, घासभूमि की स्थिति की तुलना में लगभग 35 प्रतिशत कम पाया गया। पेड़ों के बढ़ने के कुछ वर्षों बाद यह अंतर विशेष रूप से स्पष्ट होने लगा। अध्ययन में अधिक प्रवाह और कम प्रवाह—दोनों परिस्थितियों में जल उपलब्धता में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
ऐसा क्यों होता है? तेजी से बढ़ने वाले पेड़ काफी मात्रा में पानी का उपयोग कर सकते हैं। उनकी गहरी जड़ें मिट्टी की गहरी परतों से पानी खींच सकती हैं, जबकि उनकी पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) के माध्यम से पानी को वातावरण में छोड़ती हैं। इसलिए घासभूमि और वन वर्षा के पानी का उपयोग अलग-अलग तरीके से करते हैं। उरुग्वे में उपग्रह आधारित हालिया अध्ययनों में भी पाया गया है कि यूकेलिप्टस के वृक्षारोपण क्षेत्रों में समान घासभूमि की तुलना में वाष्पोत्सर्जन अधिक हो सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पेड़ पर्यावरण के लिए खराब हैं या वृक्षारोपण नहीं किया जाना चाहिए। प्राकृतिक वन जैव विविधता, जलवायु, मिट्टी और पारिस्थितिक संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। असली सवाल उचित भूमि-उपयोग योजना का है। प्राकृतिक घासभूमि को बड़े पैमाने पर एक ही प्रजाति के व्यावसायिक वृक्षारोपण में बदलने से जल संसाधनों, जैव विविधता और मिट्टी की प्रक्रियाओं पर प्रभाव पड़ सकता है।
उरुग्वे का अनुभव हमें एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सिखाता है—पर्यावरण संरक्षण केवल अधिक से अधिक पेड़ लगाने का नाम नहीं है। हमें यह भी देखना चाहिए कि उस स्थान पर पहले कौन-सा पारिस्थितिक तंत्र था, कौन-सी वृक्ष प्रजाति लगाई जा रही है, वहाँ कितनी वर्षा होती है, मिट्टी और भूजल की स्थिति कैसी है तथा नीचे की ओर रहने वाले लोगों और समुदायों की जल आवश्यकताएँ क्या हैं।
जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने में पेड़ हमारे शक्तिशाली सहयोगी हो सकते हैं, लेकिन संरक्षण के निर्णय वैज्ञानिक आधार पर होने चाहिए। कुछ परिस्थितियों में मौजूदा घासभूमि को संरक्षित करना, उसे वृक्षारोपण में बदलने की तुलना में जल सुरक्षा के लिए अधिक लाभदायक हो सकता है।
इसलिए हमारा लक्ष्य “किसी भी कीमत पर अधिक पेड़” नहीं, बल्कि “सही स्थान पर, सही प्रजाति के, सही तरीके से लगाए और प्रबंधित किए गए पेड़” होना चाहिए। उरुग्वे का अनुभव हमें याद दिलाता है कि हरियाली बढ़ने का अर्थ हमेशा पानी की उपलब्धता बढ़ना नहीं होता।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्राचार्य, शिक्षाविद् एवं प्रख्यात वैज्ञानिक
मलोट, पंजाब


