– तौफीक की मड़ैया में बाढ़ के बीच जिंदगी से खिलवाड़
– नाव मौजूद, नाविक नदारद
अमृतपुर, फर्रुखाबाद।बाढ़ में डूबे तौफीक की मड़ैया में प्रशासनिक व्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। नाव उपलब्ध है, लेकिन नाविक नहीं। लिहाजा जिन हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए, उन्हीं बच्चों के हाथों में पतवार है। महिलाएं और किशोरियां भी तेज बहाव के बीच नाव चलाकर आवागमन करने को मजबूर हैं।यह महज लापरवाही का मामला नहीं है। बाढ़ के खतरनाक बहाव में बिना प्रशिक्षित व्यक्ति से नाव चलवाना ग्रामीणों की जिंदगी को सीधे जोखिम में डालना है। सवाल यह है कि जब प्रशासन बाढ़ प्रभावित गांवों में नाव और नाविकों की व्यवस्था का दावा करता है, तो तौफीक की मड़ैया में नाविक आखिर कहां है?ग्रामीणों ने नाविकों की व्यवस्था और उनके भुगतान को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि व्यवस्था के नाम पर कागजी खानापूर्ति की जा रही है और मौके पर नाविक उपलब्ध नहीं कराया जा रहा। ग्रामीणों ने ठेकेदार की कार्यप्रणाली पर भी जांच की मांग की है।बाढ़ प्रभावित गांवों में सरकारी राहत और बचाव व्यवस्था का सबसे अहम उद्देश्य लोगों को सुरक्षित आवागमन उपलब्ध कराना है। लेकिन तौफीक की मड़ैया में हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। प्रशासन ने नाव देकर शायद अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, लेकिन नाविक की व्यवस्था और निगरानी की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें बीमारी, जरूरी सामान और अन्य कामों के लिए बाढ़ के पानी से होकर निकलना पड़ता है। ऐसे में नाव ही एकमात्र सहारा है। लेकिन नाविक के अभाव में उन्हें खुद पतवार संभालनी पड़ रही है।


