कारीगरों के घरों में बुझने लगे चूल्हे, पलायन और मजदूरी करने को मजबूर हुनरमंद हाथ
फर्रुखाबाद। कभी अपनी बारीक कढ़ाई, सुनहरी जरी और शानदार हस्तकला के लिए पहचान रखने वाला फर्रुखाबाद का जरदोजी उद्योग आज गहरे संकट से गुजर रहा है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि हजारों कारीगर भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। जिले में वर्षों से चला आ रहा यह कारोबार लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच गया है, जिससे करीब 50 हजार परिवारों के सामने रोजी-रोटी का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
एक समय था जब जिले के मोहल्लों और गांवों में देर रात तक जरदोजी कारीगरों के हाथ चलते थे। घर-घर में कढ़ाई के फ्रेम सजते थे और इस कला से हजारों परिवारों का चूल्हा जलता था। लेकिन अब बाजार में मशीनों से तैयार सस्ते उत्पाद, बढ़ती महंगाई, बिचौलियों का दबदबा और सरकारी उपेक्षा ने इस पारंपरिक उद्योग की कमर तोड़ दी है।
कारीगरों का कहना है कि मेहनताना इतना कम हो गया है कि दिन-रात मेहनत करने के बाद भी परिवार का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है। कई कारीगर अब मजबूरी में दिहाड़ी मजदूरी, रिक्शा चलाने या दूसरे छोटे-मोटे काम करने को विवश हैं। युवा पीढ़ी भी इस पेशे से दूरी बना रही है क्योंकि उन्हें इसमें भविष्य नजर नहीं आता।
स्थानीय व्यापारियों के अनुसार पहले फर्रुखाबाद से देश के बड़े शहरों और विदेशों तक जरदोजी का सामान भेजा जाता था, लेकिन अब ऑर्डर लगभग बंद हो चुके हैं। छोटे कारोबारी भी कर्ज और घाटे में डूबते जा रहे हैं।
कारीगरों ने सरकार से मांग की है कि जरदोजी उद्योग को बचाने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज, आसान ऋण, प्रशिक्षण केंद्र और सीधी बाजार व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते मदद नहीं मिली तो फर्रुखाबाद की यह ऐतिहासिक कला हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।
जरदोजी उद्योग से जुड़े लोगों का दर्द अब सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि अपनी पहचान और विरासत को बचाने की लड़ाई बन चुका है।


