– तीन बीजेपी विधायक, एक एमएलसी फिर भी जिले का प्रतिनिधित्व कमजोर
– उम्र, संगठन और पुरानी राजनीतिक फाइलें बनीं सबसे बड़ी बाधा
लखनऊ/फर्रुखाबाद। उत्तर प्रदेश में संभावित योगी मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं के बीच फर्रुखाबाद एक बार फिर राजनीतिक हाशिए पर जाता दिखाई दे रहा है। जिले में चार विधानसभा सीटों में तीन पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है, साथ ही एक विधान परिषद सदस्य भी भाजपा खेमे से जुड़ा रहा, लेकिन इसके बावजूद मंत्रिमंडल में जिले की दावेदारी कमजोर मानी जा रही है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार भी फर्रुखाबाद को प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना बेहद कम है। इसकी सबसे बड़ी वजह भाजपा के स्थानीय नेतृत्व की बदलती स्थिति, उम्र का दबाव, संगठन में पकड़ की कमजोरी और पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड माने जा रहे हैं।
अमृतपुर विधानसभा से विधायक सुशील शाक्य लंबे समय से भाजपा की राजनीति में सक्रिय रहे हैं, लेकिन अब उन्हें वरिष्ठ नेताओं की श्रेणी में देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार उनका स्वास्थ्य भी पहले जैसा नहीं रहा, जिससे उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका सीमित मानी जा रही है। यही कारण है कि मंत्रिमंडल की दौड़ में उनका नाम बेहद कमजोर बताया जा रहा है।
वहीं भोजपुर क्षेत्र से विधायक नागेंद्र सिंह राठौर भी उम्र के बड़े पड़ाव की ओर बढ़ चुके हैं। संगठन में उनका सम्मान जरूर है, लेकिन नई राजनीतिक रणनीति में भाजपा युवा और आक्रामक चेहरों को प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है। ऐसे में उनकी दावेदारी भी मजबूत नहीं मानी जा रही।
सबसे ज्यादा चर्चा सदर विधानसभा से विधायक मेजर सुनील दत्त द्विवेदी को लेकर है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मेजर द्विवेदी प्रतिभाशाली और प्रभावशाली वक्ता माने जाते हैं, लेकिन उनकी अत्यधिक व्यस्तता और लगातार विधानसभा क्षेत्र से दूरी की चर्चाएं संगठन तक पहुंचती रही हैं।
सूत्र बताते हैं कि भाजपा संगठन के भीतर यह फीडबैक भी गया कि क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संवाद सीमित रहा। इसके अलावा उनके राजनीतिक अतीत की फाइल भी समय-समय पर खुलती रही है। वर्ष 2007 में उन्होंने भाजपा छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया था। उस समय तत्कालीन मायावती सरकार में उन्हें श्रम संविदा बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था।
हालांकि उनका वह राजनीतिक सफर ज्यादा लंबा नहीं चला। बसपा नेतृत्व से मतभेद बढ़ने और अनुशाशन हीनता के आरोपों के बाद उन्हें न केवल पद से हटाया गया बल्कि पार्टी से भी बाहर कर दिया गया था । बाद में उन्होंने भाजपा में दुवारा वापसी कर ली थी , लेकिन राजनीतिक विरोधी आज भी उस “दल बदल” के अध्याय को उठाकर सवाल खड़े करते हैं।
राजनीतिक रूप से मेजर सुनील दत्त द्विवेदी का परिवार बेहद प्रभावशाली माना जाता रहा है। वह भाजपा के दिग्गज नेता और फर्रुखाबाद की राजनीति के बड़े चेहरे रहे स्वर्गीय ब्रह्मदत्त द्विवेदी के पुत्र हैं। उनकी माता प्रभा द्विवेदी भी प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुकी हैं।
इसके अलावा द्विवेदी परिवार का संबंध विधान परिषद तक रहा है, लेकिन अब बदलते राजनीतिक समीकरणों में विधान परिषद सदस्यता को लेकर भी तस्वीर साफ नहीं दिखाई दे रही। मेजर द्विवेदी के चचेरे भाई और भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष एमएलसी प्रांशु दत्त द्विवेदी का कार्यकाल खत्म होने को है उनका भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष का पद भी जाना तय साथ ही चर्चा है कि प्रदेश नेतृत्व इस बार नए सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
फर्रुखाबाद की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकार मानते हैं कि जिले में भाजपा के पास मजबूत जनाधार होने के बावजूद संगठनात्मक ऊर्जा और आक्रामक राजनीतिक उपस्थिति की कमी दिखाई देती है। यही कारण है कि हर बार जिले का नाम चर्चा में आता है लेकिन अंतिम सूची से बाहर रह जाता है।
अब बड़ा सवाल यही है कि आखिर तीन भाजपा विधायक और मजबूत राजनीतिक इतिहास होने के बावजूद फर्रुखाबाद सत्ता के केंद्र से दूर क्यों होता जा रहा है? क्या जिले में नया नेतृत्व तैयार नहीं हो पाया, या फिर स्थानीय राजनीति में अंदरूनी खींचतान ने जनपद की दावेदारी को कमजोर कर दिया?
योगी सरकार के संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में इन सवालों के जवाब भी काफी हद तक सामने आ जाएंगे।
संभावित योगी मंत्रिमंडल विस्तार में फिर पिछड़ सकता है फर्रुखाबाद!


