– गंगा एक्सप्रेसवे की रफ्तार में छूटा जिला, धरा रह गया सपना
– सियासी चुप्पी, कमजोर नेतृत्व और अकर्यमन्यता बनी कारण
फर्रुखाबाद। 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे के लोकार्पण के साथ जहां उत्तर प्रदेश के कई जिलों में विकास की नई उम्मीद जगी है, वहीं फर्रुखाबाद एक बार फिर हाशिए पर खड़ा नजर आ रहा है। सवाल सीधा है जब एक्सप्रेसवे पश्चिम से पूर्व यूपी को जोड़ रहा है, तो गंगा किनारे बसे इस जिले को क्यों नजरअंदाज कर दिया गया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्सप्रेसवे को प्रदेश की “नई लाइफलाइन” बताया, लेकिन फर्रुखाबाद के लिए यह लाइफलाइन अभी भी कागजों और घोषणाओं में ही सिमटी हुई हैं, यहां सिर्फ बड़ी-बड़ी घोषणाओं और स्वीकृतियों के दाव पर सोते कभी सर्किल रोड का ऐलान होता तो कभी बड़े-बड़े पुलों की स्वीकृति बताई जाती है, तो कभी गुरसहायगंज फतेहगढ़ मार्ग के फोरलेन होने की स्वीकृति का डिंडोरा पीटा जाता है, लेकिन हकीकत यह है की संपूर्ण उत्तर प्रदेश का विकास हो रहा लेकिन यहां आज भी झूलते जर्जर तार बजबजातीं नालियां, जल भराव, टूटी सड़के, ध्वस्त लिंक रोड, पर धक्के और ज़मीनों के कब्जे छुड़ाने की मसक्कत,गरीब जनता को पूर्व की भांति थानो के चक्कर, ही लगाने पड़ते । आसपास के जिलो हरदोई, शाहजहांपुर, बदायूं को जहां सीधा लाभ मिलने जा रहा है, वहीं फर्रुखाबाद के हिस्से में सिर्फ इंतजार और वादे आए हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि यह केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक उपेक्षा का परिणाम है। जब प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना अपने जिले हरदोई को एक्सप्रेसवे से जोड़ने में सफल हो जाते हैं, तब फर्रुखाबाद के जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या जिले की सियासी पकड़ इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह विकास की इस दौड़ में खुद को शामिल भी नहीं करा सका?
6 फरवरी 2023 को फर्रुखाबाद में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन में भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठा था, जहां साफ कहा गया था कि “जो नेता ताकतवर होता है, वही बड़ी योजनाओं को अपने जिले में लाता है।” आज वही बात हकीकत बनकर सामने है एक तरफ हरदोई विकास के नक्शे पर चमक रहा है, दूसरी तरफ फर्रुखाबाद अंधेरे में खड़ा है।
आंकड़े बताते हैं कि गंगा एक्सप्रेसवे करीब ₹36,000 करोड़ की लागत से तैयार हो रहा है और 12 जिलों को जोड़ रहा है, जिससे लाखों लोगों को रोजगार और व्यापार के नए अवसर मिलेंगे। लेकिन फर्रुखाबाद के युवाओं और किसानों के लिए यह अवसर फिलहाल दूर की कौड़ी बना हुआ है।
हालांकि सरकार ने गंगा एक्सप्रेसवे को आगरा एक्सप्रेसवे से जोड़ने के लिए लिंक एक्सप्रेसवे की योजना जरूर शुरू की है और जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी चल रही है, लेकिन जब तक मुख्य कॉरिडोर से सीधा जुड़ाव नहीं होता, तब तक इसका लाभ सीमित ही रहेगा।
स्थानीय व्यापारियों और किसानों का कहना है कि यदि फर्रुखाबाद को सीधे एक्सप्रेसवे से जोड़ा जाता, तो यहां के आलू, अनाज और अन्य उत्पादों को राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता था। लेकिन अब यह जिला एक बार फिर “पास होकर भी दूर” की स्थिति में है।
सबसे बड़ा सवाल यही है क्या फर्रुखाबाद का विकास सिर्फ घोषणाओं और योजनाओं तक सीमित रहेगा? या फिर जिले के जनप्रतिनिधि कभी इस राजनीतिक जड़ता को तोड़कर अपने क्षेत्र को भी विकास की मुख्यधारा में ला पाएंगे?
सिसकता ही रह गया अनाथ फर्रुखाबाद!


