प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि घटना स्थल से आरोपी की कोई वस्तु मिल जाना मात्र उसे दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने राम भवन हरिजन की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया और आरोपी को बरी करने का आदेश दिया।
मामला प्रयागराज जनपद के थाना लालापुर क्षेत्र का है, जहां 27 जुलाई 2021 को पांच वर्षीय बच्ची घर के पास तालाब किनारे खेलते समय लापता हो गई थी। बाद में उसका शव बरामद हुआ। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी राम भवन हरिजन ने बच्ची की हत्या कर शव को नहर में फेंक दिया। बच्ची जिस शॉल में लिपटी मिली, उसे आरोपी की बताकर उसके खिलाफ साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे, जिसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हालांकि, बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है और केस पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। कथित शॉल की पहचान भी संदिग्ध है, क्योंकि उसका उल्लेख न तो पंचनामा में है और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट में। ऐसे में आरोपी को झूठा फंसाया गया है।
वहीं, शासकीय अधिवक्ता ने तर्क दिया कि शॉल के आधार पर आरोपी की पहचान हुई और गवाहों ने अभियोजन के पक्ष का समर्थन किया है। साथ ही आरोपी और वादी के बीच पूर्व विवाद को हत्या का कारण बताया गया।
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि साक्ष्यों की कड़ी पूरी नहीं है और शॉल की बरामदगी व उसकी पहचान पर गंभीर संदेह है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी वस्तु की पहचान केवल सहायक साक्ष्य हो सकती है, न कि दोष सिद्ध करने का ठोस आधार। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट के निर्णय को खारिज करते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया और निर्देश दिया गया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।


