मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को मुंबई में आयोजित कर्मयोगी पुरस्कार समारोह में देश की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों पर महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास में तमाम विदेशी आक्रमणों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारत की असली पहचान और उसकी आत्मा को आदिवासी समुदायों और अनुसूचित जातियों ने सुरक्षित बनाए रखा।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद रहे। इस दौरान भागवत ने समाज के विभिन्न वर्गों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और मूल्य व्यवस्था को संरक्षित रखने में वंचित और पारंपरिक समुदायों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “मानव जीवन का वास्तविक अर्थ दुनिया को कुछ लौटाने में है। समाज के लिए किया गया कार्य कोई उपकार नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।” उन्होंने सेवा, समर्पण और सहयोग को भारतीय संस्कृति का मूल बताया और कहा कि दूसरों को आगे बढ़ाने से व्यक्ति स्वयं भी प्रगति करता है।
संघ प्रमुख ने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत की इसी मूल्य प्रणाली को कमजोर करने का प्रयास किया, क्योंकि यही देश की आत्मा थी। उन्होंने कहा कि तमाम प्रयासों के बावजूद आदिवासी और अनुसूचित जाति समाज ने इन मूल्यों को जीवित रखा और देश की पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखा।
मोहन भागवत ने तथाकथित शिक्षित और विकसित वर्ग से अपील करते हुए कहा कि वे इन समुदायों से दूरी खत्म करें और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आगे आएं। उन्होंने कहा कि सभी वर्गों को समान अवसर, सुविधाएं और सम्मान मिलना चाहिए, तभी समाज का संतुलित विकास संभव है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विश्व संतुलन की तलाश में है और ऐसे में भारत एक स्थिर और मार्गदर्शक शक्ति के रूप में उभर सकता है। उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर विश्व के कल्याण में योगदान दें।


