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Friday, May 8, 2026

दिल्ली पुलिस ने सेना अधिकारी बनकर ठगी करने वाला साइबर गैंग को किया गिरफ्तार

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नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस (Delhi Police) ने एक संगठित साइबर ठगी गिरोह (cyber fraud gang) का भंडाफोड़ किया है, जो खुद को भारतीय सेना और वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारी बताकर लोगों को निशाना बनाता था। पुलिस ने इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह लोगों को फर्जी पहचान और प्रभावशाली पदों का झांसा देकर उनसे पैसे ऐंठता था। हाल ही में 5 लाख रुपये की ठगी के एक मामले की जांच के दौरान पुलिस को इस नेटवर्क का सुराग मिला, जिसके बाद कार्रवाई करते हुए चारों आरोपियों को धर दबोचा गया।

जांच में सामने आया है कि आरोपी साइबर ठगी को अंजाम देने के लिए एक सुनियोजित नेटवर्क चला रहे थे। वे सिम कार्ड और बैंक खातों की व्यवस्था भी बाहरी लोगों से कराते थे। आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि उन्होंने लगभग 1,500 रुपये प्रति सिम कार्ड के हिसाब से करीब 30 सिम कार्ड हासिल किए थे। इसके अलावा, 6,000 रुपये प्रति बैंक खाते की दर से छह बैंक खाते भी उपलब्ध कराए गए थे, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम ट्रांसफर करने में किया जाता था।

शिकायतकर्ता ने पुलिस को बताया कि कुछ अज्ञात लोगों ने खुद को भारतीय वायु सेना का अधिकारी बताकर उससे औद्योगिक उपयोग में आने वाले एल्युमिनस लैटेराइट (40–45% ग्रेड) की खरीद और सप्लाई का सौदा करने की बात की थी। भरोसा जमाने के लिए आरोपियों ने उसे भारतीय वायु सेना द्वारा जारी किया गया एक कथित परचेज ऑर्डर (क्रय आदेश) भी दिखाया। जांच में बाद में यह साफ हो गया कि वह परचेज ऑर्डर पूरी तरह फर्जी था और केवल ठगी के इरादे से तैयार किया गया था। इसी फर्जी दस्तावेज और सैन्य अधिकारी होने के झूठे दावे के जरिए आरोपियों ने पीड़ित का विश्वास जीतने की कोशिश की थी।

आरोपियों के झांसे में आकर पीड़ित ने जब तय किया गया सामान भेज दिया, तो जालसाजों ने नया बहाना बनाते हुए कहा कि उसका नाम “स्वीकृत वेंडर सूची” में शामिल नहीं है। इसके बाद उन्होंने वेंडर रजिस्ट्रेशन और औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर उससे अतिरिक्त पैसे जमा कराने की मांग शुरू कर दी। इसी दौरान पीड़ित को शक हुआ कि उसके साथ ठगी हो रही है। उसने तुरंत मामले की शिकायत पुलिस से की। शिकायतकर्ता के अनुसार इस पूरी धोखाधड़ी के चलते उसे कुल 5,06,415 रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। शिकायत के आधार पर दिल्ली क्राइम ब्रांच ने मामला दर्ज कर लिया और जालसाजी, फर्जी पहचान का उपयोग कर धोखाधड़ी करने समेत संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की गई।

मामले की गंभीरता और इसके अंतर-राज्यीय नेटवर्क को देखते हुए पुलिस ने एक विशेष जांच टीम (SIT) का गठन किया। टीम ने तकनीकी निगरानी और खुफिया जानकारी के आधार पर उस SIM कार्ड के उपयोगकर्ताओं की पहचान कर ली, जिससे पीड़ित से संपर्क किया गया था। जांच में सामने आया कि यह SIM कार्ड जिन लोगों के नाम पर जारी था, उनकी पहचान मनीष और कौशल के रूप में हुई, जो उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर और अलीगढ़ के रहने वाले हैं। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।

इसके बाद कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए इस गिरोह के दो अन्य सक्रिय सदस्यों बुरहान उर्फ आमिर और रिजवान अहमद को भी पकड़ा गया, जो हरियाणा के नूंह (मेवात) क्षेत्र के निवासी बताए गए हैं। पूछताछ में आरोपियों ने स्वीकार किया कि इस पूरे साइबर फ्रॉड के लिए अलग-अलग व्यक्तियों के नाम पर कई SIM कार्ड खरीदे जाते थे। इन SIM कार्ड्स को बाद में गिरोह के अन्य सदस्यों को दे दिया जाता था, जो खुद को भारतीय सेना और वायु सेना के अधिकारी बताकर व्यापारियों और सप्लायर्स को निशाना बनाते थे।

आरोपियों ने पूछताछ में यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने पूरे नेटवर्क को सक्रिय रखने के लिए सिम कार्ड और बैंक खातों की एक अलग सप्लाई चेन बना रखी थी। इस व्यवस्था के तहत लगभग 1,500 रुपये प्रति सिम कार्ड की दर से करीब 30 सिम कार्ड खरीदे गए, जबकि 6,000 रुपये प्रति खाते की दर से छह बैंक खातों की व्यवस्था की गई थी, जिनका उपयोग ठगी की रकम के लेन-देन में किया जाता था। पुलिस ने इस मामले में अब तक चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनकी पहचान मनीष, कौशल, आमिर और रिजवान अहमद के रूप में हुई है। इन सभी से पूछताछ के आधार पर अन्य सहयोगियों की तलाश में लगातार छापेमारी और तलाशी अभियान चलाया जा रहा है।

जांच में यह भी सामने आया है कि यह गिरोह खुद को भारतीय वायु सेना का अधिकारी बताकर एक संगठित साइबर धोखाधड़ी रैकेट चला रहा था। व्यापारियों और सप्लायर्स का भरोसा जीतने के लिए आरोपी फर्जी पहचान पत्र, जाली क्रय आदेश और अन्य मनगढ़ंत सरकारी दस्तावेजों का इस्तेमाल करते थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर वे बड़े ऑर्डर देकर सामान मंगवाते और बाद में वेंडर रजिस्ट्रेशन या अन्य औपचारिकताओं के नाम पर अतिरिक्त पैसे वसूलने की कोशिश करते थे।

आरोपियों ने पूछताछ में यह भी बताया कि जब व्यापारी तय जगह पर सामान पहुंचा देते थे, तो इसके बाद उन्हें “अकाउंट मैपिंग”, “वेंडर रजिस्ट्रेशन” या अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं के नाम पर अतिरिक्त रकम जमा करने के लिए दबाव बनाया जाता था। जिन मामलों में पीड़ित पैसे जमा कर देते थे, वहां आरोपी आगे भी अलग-अलग बहाने बनाकर लगातार और धनराशि की मांग करते रहते थे, जिससे यह ठगी का सिलसिला लंबा चलता जाता था और पीड़ित बार-बार आर्थिक नुकसान उठाते थे।

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