(सुधाकर आशावादी-विभूति फीचर्स)
जिसका काम उसी को साजे, और कोई करे तो मुसीबत बाजे। कहते हैं न कि नाचने के लिए शरीर में क्षमता भी होनी चाहिए और नृत्य कौशल भी। फिर भी कव्वा चले हंस की चाल और अपनी भी चाल भूल जाए। व्यवहार में ऐसा होता ही है। रंगमंच उनके लिए हैं, जो अभिनय में निपुण होते हैं। जिसे अभिनय का अ भी समझ न आए और वह अभिनय करने लगे, तो हंसी का पात्र तो बनता है साथ ही बिन बुलाई मुसीबतों का आमंत्रित कर लेता है।
अपने बड़बोले मित्र इसी का शिकार हैं। उन्हें कोई अपने आस पास बिठाना नहीं चाहता और वह बिन बुलाए कहीं भी जा धमकते हैं। बड़बोले हैं, कभी अपने गिरेबान में नहीं झांकते, पर दूसरों पर उँगलियाँ उठाते रहते हैं। हुआ यूँ कि किसी ने मित्र महोदय से कह दिया कि बड़ी हवेली के परिसर में नाटक करेंगे। उन्हें नाटक करने की आजादी है। वह झाड़ पर चढ़ गए। उन्होंने साधु का वेश धारण कर लिया, गले में अनेक मालाएं धारण कर ली। हाथ की कलाइयों में भी माला लपेट ली। माथे पर लम्बा तिलक लगाकर अपने सम्मुख दान पात्र रखकर बैठ गए। इस नाटक में अनेक नाटक बाज उनके इर्द गिर्द इकट्ठा हो गए। नाटक बाज भी ऐसे जिन्हें केवल नौटंकी से सरोकार था। जो कभी कमीज पर जनेऊ धारण करते थे, कभी अन्य किसी प्रकार की नौटंकी के लिए मशहूर थे। बहरहाल नाटक कोई खास सन्देश देने के लिए था, किन्तु उस नाटक में उपहास सन्यासियों का ही उड़ाया गया, उन्हें चोर सिद्ध करके बदनाम करने के लिए किया गया।
मित्र महोदय और उनके संगी साथी भी जानते थे, कि केवल साधु सन्यासियों को ही बदनाम किया जा सकता है, अन्य किसी भी धर्म गुरु का वेश धारण करने में संकट उत्पन्न हो सकता है। सो साधु का वेश धारण करके साधु सन्यासियों का जितना उपहास उड़ाया जा सकता था, उतना उन्होंने उड़ाया। नाम दिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का। आखिर सब्र की भी अपनी सीमा होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल मित्र महोदय के लिए नहीं थी, अन्य के लिए भी थी। सो घर बार छोड़कर साधु बने सन्यासी क्रोध से भर उठे। यह स्वाभाविक भी था। क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। साधुओं की टोली मित्र महोदय के घर पहुंच गई। प्रदर्शन करने लगी। कहने लगी कि साधु का वेश धारण करके साधुओं का उपहास उड़ाने वाले को साधु की परिभाषा समझायेंगे। साधु परम्परा से अवगत कराएंगे। सन्यास आश्रम में उनका विधि विधान से प्रवेश कराएंगे। पहले उनसे उनका पिंडदान कराएंगे, फिर उनसे भिक्षा मंगवाएंगे। पहले भिक्षा उस महिला से दिलाएंगे, जो कभी उनकी अर्धांगिनी रही हो। फिर उन्हें अखाड़े में ले जाएंगे। मित्र महोदय ने नाटक करते समय तस्वीर के दूसरे पहलू के बारे में सोचा ही नहीं था। अब मित्र महोदय परेशान हैं। उनके लिए आगे कुआं पीछे खाई जैसी स्थिति बनी हुई है। वह समझ नहीं पा रहे हैं , कि अपने घर जाएं या न जाएं। उनके संगी साथी जो उनके साथ साधुओं का उपहास उड़ाने में साथी कलाकार की भूमिका निभा रहे थे, सुना है कि उन्होंने भी उनसे दूरी बना ली है। (विभूति फीचर्स)


