फर्रुखाबाद। शहर के मोहल्ला गुड़री जनबरान पूर्व, रेलवे रोड स्थित ब्रिटिश कालीन लाला लक्ष्मी नारायण अग्रवाल मेमोरियल ट्रस्ट की संपत्ति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए स्थापित इस ऐतिहासिक ट्रस्ट की संपत्ति को नियमों के विपरीत व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया गया है और इससे होने वाली आय निजी हाथों में जा रही है।
जानकारों के अनुसार ट्रस्ट डीड में तत्कालीन व्यवस्था के तहत तहसीलदार सदर, फर्रुखाबाद को ट्रस्ट का अध्यक्ष तथा म्युनिसिपल बोर्ड (वर्तमान नगर पालिका परिषद) को सचिव नामित किया गया था। ऐसे में ट्रस्ट की संपत्तियों का प्रबंधन एवं आय सार्वजनिक हित और धर्मार्थ कार्यों के लिए उपयोग किए जाने का प्रावधान बताया जाता है।
आरोप है कि ट्रस्ट परिसर में स्थित पुरानी धर्मशाला को ध्वस्त कर वहां की लकड़ी, लोहा तथा अन्य निर्माण सामग्री बेच दी गई। इसके बाद उसी भूमि पर दुकानों का निर्माण कर उन्हें कथित रूप से भारी पगड़ी लेकर किराए पर उठा दिया गया।
मामले में यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि यदि संपत्ति ट्रस्ट की है तो दुकानों से प्राप्त होने वाला किराया किस खाते में जमा हो रहा है? स्थानीय लोगों का कहना है कि ट्रस्ट परिसर के बाहर स्थित एक पुरानी दुकान, जिसे लोग “जींस हाउस” के नाम से जानते हैं, उसका किराया तहसील में जमा होता है। ऐसे में ट्रस्ट की अन्य दुकानों से प्राप्त आय भी सरकारी अभिरक्षा में जाकर ट्रस्ट के उद्देश्य पर खर्च होनी चाहिए।
आरोपों के केंद्र में सुनील कुमार अग्रवाल का नाम सामने आ रहा है, जिन पर स्वयं को ट्रस्ट का सर्वेसर्वा बताकर संपत्ति के उपयोग और दुकानों के निर्माण की अनुमति लेने का आरोप लगाया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित पक्ष का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह वास्तव में सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति है तो धर्मशाला को व्यावसायिक परिसर में बदलने की अनुमति किसने दी? क्या ट्रस्ट डीड की शर्तों का पालन किया गया? दुकानों से होने वाली आय का हिसाब-किताब कहां दर्ज है? और क्या तहसील तथा नगर पालिका को इसकी पूरी जानकारी है?
स्थानीय नागरिकों की मांग है कि पूरे मामले की राजस्व, नगर पालिका और न्यायिक स्तर पर निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि संपत्ति ट्रस्ट की पाई जाती है तो उसकी आय को राजकीय अभिरक्षा में लेकर मूल उद्देश्य के अनुरूप धर्मशाला एवं जनहित कार्यों के लिए उपयोग किया जाए।
यह मामला केवल एक भवन या जमीन का नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक धर्मार्थ ट्रस्ट की विरासत, पारदर्शिता और जनहित से जुड़ा हुआ है। इसलिए प्रशासनिक जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।


