नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच बासमती चावल के वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा एक बार फिर चर्चा में है। ईरान-अमेरिका के बीच शांति समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री व्यापार सामान्य होने लगा है। इसी बीच पाकिस्तान ने अपने बासमती चावल निर्यातकों को टैक्स रिफंड देकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ती कीमतों पर चावल बेचने की रणनीति अपनाई है, जिससे भारत के प्रमुख निर्यात बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
पाकिस्तान की नई योजना के तहत 750 डॉलर प्रति टन या उससे अधिक कीमत वाले बासमती चावल के निर्यात पर 9 प्रतिशत तक टैक्स रिफंड दिया जा रहा है, जबकि कम कीमत वाले चावल पर 3 प्रतिशत की राहत उपलब्ध कराई जा रही है। इस कदम का उद्देश्य मिडिल ईस्ट और यूरोप के बाजारों में पाकिस्तानी चावल को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।पाकिस्तान की यह रणनीति भारत के लिए तत्काल बड़ा खतरा नहीं है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बासमती चावल उत्पादक और निर्यातक देश है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित 1121 बासमती किस्म की वैश्विक बाजार में विशेष मांग है और इससे देश को हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
भारत के प्रमुख खरीदार देशों में सऊदी अरब, ईरान, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर और ओमान शामिल हैं। इन देशों में भारतीय ब्रांडों की मजबूत पहचान और वर्षों पुराना व्यापारिक नेटवर्क भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। दूसरी ओर पाकिस्तान को हाल के महीनों में चावल निर्यात में गिरावट का सामना करना पड़ा है, जिससे उसकी नई योजना की सफलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
पाकिस्तान कम कीमत के जरिए कुछ बाजार हिस्सेदारी हासिल कर सकता है, लेकिन उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, ब्रांड वैल्यू और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला के कारण वैश्विक बासमती बाजार में भारत का दबदबा निकट भविष्य में कायम रहने की संभावना है।
मिडिल ईस्ट का बाजार दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और आने वाले महीनों में बासमती चावल के निर्यात को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।


