– फैसले ने फिर छेड़ी पुराने विवादों की बहस
जयपुर। देश के चर्चित और विवादित संतों में शामिल आसाराम बापू को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने गैंगरेप और पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामले में आसाराम को बरी कर दिया है। हालांकि नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के मामले में पहले से सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को अदालत ने बरकरार रखा है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर देशभर में आसाराम से जुड़े मामलों, तथाकथित आध्यात्मिक साम्राज्य और लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई पर चर्चा तेज हो गई है। अदालत ने इस मामले में सह आरोपी शरद और शिल्पी को भी संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
यह मामला वर्षों पहले उस समय सुर्खियों में आया था जब एक नाबालिग छात्रा ने जोधपुर स्थित आश्रम में यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे। आरोपों के बाद पूरे देश में सनसनी फैल गई थी और तथाकथित धर्मगुरुओं की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े हुए थे। जांच एजेंसियों ने मामले में कई सबूत जुटाए थे, जिसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आसाराम को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
अब राजस्थान हाईकोर्ट ने गैंगरेप और पॉक्सो की कुछ धाराओं में राहत देते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर आरोप सिद्ध नहीं हो सके। हालांकि अदालत ने मुख्य दुष्कर्म मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए सजा को बरकरार रखा।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक यह फैसला “आंशिक राहत” की श्रेणी में आता है, क्योंकि आसाराम जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे। उनकी उम्रकैद की सजा यथावत रहने से उन्हें कारावास में ही रहना होगा।
फैसले के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। एक वर्ग इसे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग सवाल उठा रहा है कि आखिर इतने वर्षों तक चले चर्चित मुकदमे में अलग-अलग धाराओं पर अदालत का नजरिया क्यों बदला।
आसाराम का नाम पिछले एक दशक में कई विवादों से जुड़ा रहा है। कभी करोड़ों अनुयायियों और विशाल आश्रम नेटवर्क के लिए चर्चित रहे आसाराम पर यौन शोषण, जमीन कब्जा, धमकी और संदिग्ध मौतों जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई के बाद देशभर में कई आश्रमों की गतिविधियां भी जांच के दायरे में आई थीं।
राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी यह मामला लंबे समय तक बहस का केंद्र बना रहा। एक ओर समर्थक इसे “साजिश” बताते रहे, वहीं दूसरी ओर महिला अधिकार संगठनों ने इसे धर्म की आड़ में अपराध का बड़ा उदाहरण करार दिया।
अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद संभावना जताई जा रही है कि मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि फैसले की विस्तृत प्रति आने के बाद अभियोजन और बचाव पक्ष आगे की रणनीति तय करेंगे।


