डॉ विजय गर्ग
एक समय था जब भारतीय रेलवे स्टेशनों पर बुक स्टॉल यात्रियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। ट्रेन का इंतज़ार हो या लंबी यात्रा, लोग एक उपन्यास, पत्रिका, अख़बार या बच्चों की किताब खरीदना नहीं भूलते थे। रेलवे स्टेशनों के पुस्तक स्टॉल केवल किताबें बेचने की जगह नहीं थे, बल्कि वे पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने वाले छोटे-छोटे ज्ञान केंद्र भी थे। आज वही बुक स्टॉल डिजिटल युग की तेज़ रफ्तार में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने लोगों के समय बिताने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। पहले यात्रा के दौरान लोग किताबें पढ़ते थे, लेकिन अब अधिकांश यात्री मोबाइल फोन पर वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं या ऑनलाइन गेम खेलते हैं। ई-पुस्तकों और डिजिटल समाचार माध्यमों ने भी मुद्रित पुस्तकों और पत्रिकाओं की मांग को प्रभावित किया है।
रेलवे स्टेशनों पर पत्रिकाओं और अख़बारों की बिक्री में लगातार गिरावट आई है। बच्चों की कॉमिक्स, ज्ञानवर्धक पत्रिकाएँ और लोकप्रिय उपन्यास, जो कभी सबसे अधिक बिकते थे, अब सीमित संख्या में ही खरीदे जाते हैं। कई छोटे स्टेशनों पर बुक स्टॉल बंद हो चुके हैं, जबकि बड़े स्टेशनों पर भी उनकी रौनक पहले जैसी नहीं रही।
हालाँकि समस्या केवल डिजिटल माध्यमों की नहीं है। पुस्तकों की बढ़ती कीमतें, पढ़ने की घटती आदत, व्यस्त जीवनशैली और त्वरित मनोरंजन की बढ़ती उपलब्धता ने भी इस बदलाव को तेज़ किया है। नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग स्क्रीन पर पढ़ना अधिक सुविधाजनक मानता है।
फिर भी उम्मीद पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी अनेक यात्री यात्रा के दौरान पुस्तक पढ़ने का आनंद लेना पसंद करते हैं। यदि रेलवे बुक स्टॉल आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को बदलें, तो वे फिर से लोकप्रिय बन सकते हैं। पुस्तकों के साथ ई-बुक वाउचर, शैक्षिक सामग्री, प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें, स्थानीय भाषा का साहित्य, बच्चों के लिए आकर्षक पुस्तकें और लेखकों के साथ संवाद जैसे कार्यक्रम यात्रियों को आकर्षित कर सकते हैं।
भारतीय रेलवे भी स्टेशनों को केवल आवागमन का केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का स्थान बना सकती है। “रीडिंग कॉर्नर”, मिनी लाइब्रेरी, पुस्तक प्रदर्शनियाँ और स्थानीय लेखकों की पुस्तकों को प्रमुख स्थान देकर पढ़ने की संस्कृति को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
डिजिटल तकनीक और मुद्रित पुस्तकों को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक माना जाना चाहिए। स्क्रीन त्वरित सूचना दे सकती है, लेकिन पुस्तकें गहराई से सोचने, कल्पनाशक्ति विकसित करने और एकाग्रता बढ़ाने का अवसर देती हैं।
रेलवे बुक स्टॉल केवल व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं हैं; वे भारत की समृद्ध पठन संस्कृति की विरासत हैं। यदि समाज, प्रकाशक और रेलवे मिलकर इन्हें नए स्वरूप में विकसित करें, तो ये स्टॉल एक बार फिर यात्रियों की पहली पसंद बन सकते हैं। डिजिटल युग में भी किताबों की खुशबू और पन्नों की सरसराहट का अपना अलग ही आकर्षण है, जिसे किसी स्क्रीन से पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


