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Saturday, July 4, 2026

विद्यार्थियों में बढ़ती अनुशासनहीनता और संस्कारों का अभाव : एक गंभीर सामाजिक चुनौती

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डॉ एस. के. त्रिपाठी
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यार्थियों के हाथों में होता है। आज का विद्यार्थी ही कल का वैज्ञानिक, शिक्षक, चिकित्सक, सैनिक, प्रशासक और जनप्रतिनिधि बनकर देश का नेतृत्व करता है। इसलिए यदि विद्यार्थियों का चरित्र सुदृढ़, अनुशासित और संस्कारवान होगा तो राष्ट्र भी मजबूत और समृद्ध बनेगा। लेकिन वर्तमान समय में विद्यार्थियों में बढ़ती अनुशासनहीनता और संस्कारों का क्षरण समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।

आज का दौर तकनीक का युग है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने शिक्षा को आसान बनाया है, लेकिन इनका अनियंत्रित उपयोग विद्यार्थियों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव भी डाल रहा है। कई विद्यार्थी पढ़ाई से अधिक समय मोबाइल, ऑनलाइन गेम, शॉर्ट वीडियो और सोशल मीडिया पर बिताने लगे हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, एकाग्रता, व्यवहार और मानसिक विकास पर दिखाई देता है।

आर्मी पब्लिक स्कूल के वरिष्ठ अध्यापक एवं शिक्षाविद् डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी का मानना है कि अनुशासनहीनता का सबसे बड़ा कारण परिवार और विद्यालय के बीच घटता संवाद है। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों को दादा-दादी और बड़े-बुजुर्गों से जीवन के संस्कार सहज रूप से मिल जाते थे। आज एकल परिवार, व्यस्त जीवनशैली और समय की कमी के कारण बच्चों को वह वातावरण नहीं मिल पाता, जिसकी उन्हें आवश्यकता है। माता-पिता की व्यस्तता के कारण बच्चों के व्यवहार और दिनचर्या पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा पाता।

संस्कार केवल धार्मिक या सांस्कृतिक परंपराओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। बड़ों का सम्मान करना, सत्य बोलना, समय का पालन करना, जिम्मेदारियों को निभाना, दूसरों के प्रति संवेदनशील होना और समाज के नियमों का पालन करना ही वास्तविक संस्कार हैं। जब इन मूल्यों का अभाव होता है तो विद्यार्थियों में असहिष्णुता, आक्रामकता, अनुशासनहीनता और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी जैसी प्रवृत्तियां विकसित होने लगती हैं।

विद्यालय केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान देने का केंद्र नहीं है, बल्कि चरित्र निर्माण की भी सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। इसलिए विद्यालयों में नैतिक शिक्षा, योग, प्रार्थना, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों और सामूहिक कार्यक्रमों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। शिक्षक स्वयं अपने आचरण से विद्यार्थियों के लिए आदर्श प्रस्तुत करें, क्योंकि बच्चे उपदेश से अधिक व्यवहार से सीखते हैं।

परिवार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माता-पिता बच्चों के साथ प्रतिदिन समय बिताएं, उनसे संवाद करें, उनकी समस्याओं को समझें और मोबाइल या इंटरनेट के उपयोग पर संतुलित नियंत्रण रखें। बच्चों को केवल भौतिक सुविधाएं देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार, अनुशासन और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देना भी उतना ही आवश्यक है।

समाज को भी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभानी होगी। यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का संकल्प लें, तो अनुशासनहीनता जैसी समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। केवल परीक्षा में अच्छे अंक ही सफलता का मापदंड नहीं हैं, बल्कि अच्छा चरित्र, जिम्मेदार नागरिकता और मानवीय मूल्य ही किसी विद्यार्थी की वास्तविक पहचान हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम न मानकर जीवन निर्माण का आधार बनाया जाए। अनुशासन और संस्कार शिक्षा की आत्मा हैं। यदि आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान, जिम्मेदार और चरित्रवान बनाया गया, तो निश्चित रूप से भारत एक सशक्त, सभ्य और विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व का नेतृत्व करेगा।

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