भरत चतुर्वेदी
भारतीय आध्यात्मिक चिंतन की सबसे विलक्षण विशेषता यह है कि वह ईश्वर को किसी सीमित स्थान, मूर्ति, जाति, संप्रदाय या आकाश के किसी दूरस्थ लोक तक सीमित नहीं मानता। सनातन दर्शन उद्घोष करता है— “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। जो कुछ दिखाई देता है, जो दिखाई नहीं देता, जो स्थूल है और जो सूक्ष्म है, सब उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में अक्रूर जी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति इसी विराट दर्शन का अद्भुत चित्र प्रस्तुत करती है। अक्रूर जी कहते हैं कि अग्नि भगवान का मुख है, पृथ्वी उनके चरण हैं, सूर्य और चंद्रमा उनके नेत्र हैं, आकाश उनकी नाभि है, दिशाएं उनके कान हैं और स्वर्ग उनका मस्तक है। समुद्र उनकी कोख है, वायु उनके प्राण हैं, वृक्ष और औषधियां उनके रोम हैं तथा पर्वत उनकी अस्थियां हैं। दिन और रात उनकी पलकों के समान हैं और वर्षा उनके जीवनदायी वीर्य के रूप में कल्पित है।
यह वर्णन केवल काव्यात्मक कल्पना नहीं है, बल्कि भारतीय दर्शन की गहरी आध्यात्मिक अनुभूति का प्रतीक है। इसका संदेश है कि प्रकृति और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं। जो व्यक्ति प्रकृति का सम्मान करता है, वह वास्तव में ईश्वर का सम्मान करता है। जो वृक्षों की रक्षा करता है, वह भगवान के रोमों की रक्षा करता है। जो नदियों को स्वच्छ रखता है, वह ईश्वर के जीवन प्रवाह को पवित्र रखता है।
आज का आधुनिक संसार पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और आध्यात्मिक शून्यता से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारतीय ऋषियों की यह दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। यदि मनुष्य यह समझ ले कि पृथ्वी केवल मिट्टी का गोला नहीं बल्कि ईश्वर के चरण हैं, तो वह उसका शोषण नहीं करेगा। यदि वह सूर्य को केवल गैस का गोला नहीं बल्कि भगवान का नेत्र माने, तो उसके भीतर कृतज्ञता का भाव जागृत होगा।
सनातन संस्कृति में इसी कारण नदियों को माता, पृथ्वी को देवी, वृक्षों को पूज्य और पर्वतों को दिव्य माना गया है। यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरी संवेदनशीलता और आध्यात्मिक सम्मान का भाव है। भारतीय संस्कृति का यह दृष्टिकोण मनुष्य को उपभोगकर्ता नहीं, बल्कि सृष्टि का संरक्षक बनने की प्रेरणा देता है।
भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का यह वर्णन हमें बताता है कि ईश्वर केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि हर कण में विद्यमान हैं। जब मनुष्य इस सत्य का अनुभव कर लेता है, तब उसके भीतर अहंकार समाप्त हो जाता है। वह किसी जीव से घृणा नहीं करता, किसी जाति या वर्ग को छोटा नहीं समझता और सम्पूर्ण सृष्टि को अपने परिवार के रूप में देखने लगता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” की इस महान अवधारणा को केवल शास्त्रों तक सीमित न रखें, बल्कि अपने व्यवहार में उतारें। प्रकृति संरक्षण, जीवों के प्रति करुणा, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक जागरण का यही मूल आधार है।
भारतीय दर्शन का यह संदेश मानवता को बताता है कि ईश्वर को पाने के लिए केवल आकाश की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। जब हम पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश और समस्त जीव-जगत में उसी परम चेतना का दर्शन करने लगते हैं, तभी सच्चे अर्थों में भगवान के विराट स्वरूप का साक्षात्कार होता है। यही सनातन धर्म का वैश्विक संदेश है और यही मानव सभ्यता के लिए शाश्वत मार्गदर्शन भी।


