
डॉ विजय गर्ग
आईसीएमआर और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें सचेत कर रही हैं कि अत्यधिक गर्मी और लगातार अधूरी नींद इंसानी शरीर के भीतर तापमान नियंत्रित करने की क्षमता को नष्ट कर देती है। जब लगातार कई दिनों तक इंसान की नींद पूरी नहीं होती, तो शरीर में तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है।
जेठ की तपती दोपहरी में जब पारा 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है, तो महानगरों की आलीशान इमारतों के पीछे छिपा एक डरावना और कड़वा सच बाहर आने लगता है। दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत और चिलचिलाती धूप का सामना करने के बाद जब एक आम कामकाजी इंसान शाम को अपने घर लौटता है, तो उसे कुछ पल के सुकून और चैन की नींद की उम्मीद होती है। लेकिन आधुनिकता और अनियंत्रित विकास के दौर में हमारे महानगर रहने लायक ठिकाने कम और ‘तपते तवे’ अधिक बन चुके हैं। बुनियादी ढांचे का चरमराना, ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का बढ़ता प्रभाव, पानी का गंभीर संकट और उस पर से बेहिसाब बिजली कटौती ने इंसान के जीवन को एक दुःस्वप्न में बदल दिया है। संकट अब शारीरिक थकावट या पसीने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमेंे गंभीर रूप से शारीरिक व मानसिक रूप से बीमार बना रहा है।
मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद धरती ठंडी होती है और रातें सुकून देती हैं। लेकिन हमारे महानगरों में यह प्राकृतिक चक्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, जिसका मुख्य कारण ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव है। जब किसी शहर में पेड़-पौधों, तालाबों और खुली जमीनों को बेरहमी से खत्म करके वहां डामर की सड़कें, कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें और कांच के शीशों से ढके टॉवर खड़े कर दिए जाते हैं, तो वे दिनभर सूरज की भीषण गर्मी को अपने भीतर सोख लेते हैं। रात के समय, जब तापमान कम होना चाहिए, ये कंक्रीट के ढांचे उस सोखी हुई गर्मी को वापस वातावरण में छोड़ना शुरू करते हैं। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ के वैज्ञानिक अध्ययन पुष्टि करते हैं कि महानगरों में रात का तापमान ग्रामीण या खुले इलाकों की तुलना में 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज हो रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि महानगरों में रातें अब दिनों से भी ज्यादा भारी और उमस भरी हो रही हैं।
इस भयंकर रात की उमस में जब ‘पावर कट’ या बिजली कटौती का झटका लगता है, तो नागरिक पूरी तरह असहाय हो जाता है। इन्वर्टर कुछ घंटों में दम तोड़ देते हैं, पानी की मोटरें शांत हो जाती हैं और हवा का नामोनिशान मिट जाता है। आईसीएमआर और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें सचेत कर रही हैं कि अत्यधिक गर्मी और लगातार अधूरी नींद इंसानी शरीर के भीतर तापमान नियंत्रित करने की क्षमता को नष्ट कर देती है। जब लगातार कई दिनों तक इंसान की नींद पूरी नहीं होती, तो शरीर में तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है। यही कारण है कि लोग ‘एक्यूट’ यानी गंभीर और अचानक उभरने वाली बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। बड़े शहरों के सरकारी अस्पतालों की आपातकालीन ओपीडी के आंकड़े बताते हैं कि मई-जून के महीनों में हीट स्ट्रोक, अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ना, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर डिहाइड्रेशन और किडनी फेलियर के मामलों में एक-तिहाई से ज्यादा की वृद्धि देखी जा रही है। जब पानी का अभाव और अगले दिन बिना सोए दफ्तर या काम पर जुटने की चिंता जुड़ती है, तो इंसान अंदर से पूरी तरह टूट जाता है।
संकट का सबसे भयावह और मूक पहलू महानगरों में मानसिक रोगियों की बढ़ती फौज है। गर्मी और बिजली संकट को अक्सर हम केवल एक भौतिक या प्रशासनिक समस्या मानते हैं, लेकिन यह सीधे तौर पर हमारी मानसिक सुदृढ़ता पर हमला कर रहा है। ‘द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ’ में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, तापमान में प्रति एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और अवसाद के मामलों में दो प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी होती है। लगातार अनिद्रा और शारीरिक कष्ट के कारण लोग गंभीर चिड़चिड़ेपन, घबराहट और क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम का शिकार हो रहे हैं। अत्यधिक गर्मी से उसकी मानसिक सहनशीलता समाप्त हो जाती है। महानगरों में घरेलू हिंसा, सड़कों पर मामूली बात पर होने वाली ‘रोड रेज’ की हिंसक घटनाएं और दफ्तरों में कर्मचारियों के बीच बढ़ते टकराव के पीछे इस ‘थर्मल स्ट्रेस’ का बहुत बड़ा हाथ है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, इन दिनों ओपीडी में आने वाले हर पांचवें मरीज में अनिद्रा और गर्मी जनित मानसिक तनाव मुख्य कारण बनकर उभर रहा है।
यह स्थिति हमारी नीतिगत विफलताओं का आईना है। गर्मियों के दिनों में महानगरों के उपनगरों और रिहायशी सोसायटियों में हाहाकार मचा रहता है। ट्रांसफार्मर फुंकने और केबल जलने की घटनाएं आम हैं क्योंकि बिजली के बुनियादी ढांचे पर क्षमता से अधिक लोड है। हर कोई अपनी जान बचाने के लिए एसी और कूलर चलाने को मजबूर है, लेकिन हमारा वितरण ग्रिड इस मांग को संभालने में सक्षम नहीं है। ऐसे में अमीर वर्ग तो भारी-भरकम डीजल जनरेटरों के सहारे कुछ राहत पा लेता है, जो खुद प्रदूषण बढ़ाकर हवा को और गर्म करते हैं, लेकिन मध्यम और निम्न वर्ग के लोग कंक्रीट के छोटे-छोटे कमरों में ‘तंदूर’ की तरह पकने को मजबूर हैं। पानी के टैंकरों के पीछे लगती लंबी लाइनें और पानी के लिए होते झगड़े प्रमाण हैं कि नगरीय ढांचा चरमरा चुका है।
यदि हमें अपने शहरों को बीमारों का घर बनने से रोकना है, तो पारंपरिक सोच से हटकर नए और साहसिक कदम उठाने होंगे। प्रशासन को चाहिए कि दिन के बजाय रात के समय आवासीय परिसरों और कॉलोनियों की सड़कों पर स्प्रिंकलर ट्रकों को लगातार चलाए। इससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ के प्रभाव को सीधे तौर पर कम किया जा सकता है। इससे डामर और कंक्रीट द्वारा सोखी गई गर्मी शांत होगी, जिससे रात के तापमान में गिरावट से कुछ राहत मिल सकेगी।
इसके साथ ही, शहरी नियोजन में ‘व्हाइट रूफिंग’ को बढ़ावा देना होगा और बिजली वितरण प्रणाली को सौर ऊर्जा के ग्रिड से जोड़कर मजबूत करना होगा ताकि ग्रिड फेल होने की नौबत न आए। बिजली, पानी और ठंडी हवा अब कोई विलासिता नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन जीने के मौलिक अधिकार का हिस्सा हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में शहरों के बुनियादी ढांचे को पर्यावरण के अनुकूल और मानवीय बनाना होगा।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


