41 C
Lucknow
Thursday, May 21, 2026

सोशल मीडिया की चमक ने बढ़ाई दूरी

Must read

– अब नेता और व्यापारी पारंपरिक मीडिया से बना रहे किनारा
सोनल दीक्षित
एक समय था जब नेता, व्यापारी और सामाजिक संस्थाएं अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए अखबारों, पत्रकारों और जमीनी मीडिया का सहारा लेते थे। किसी भी जनप्रतिनिधि की लोकप्रियता का पैमाना यह माना जाता था कि वह जनता और पत्रकारों के सवालों का सामना कितनी गंभीरता से करता है। लेकिन डिजिटल दौर में तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब फर्रुखाबाद समेत कई जिलों में नेता और बड़े व्यापारी पारंपरिक मीडिया से दूरी बनाकर सोशल मीडिया प्रचार को ज्यादा महत्व देने लगे हैं।

कारण साफ है सोशल मीडिया पर सवाल कम और नियंत्रण ज्यादा रहता है। यहां कैमरा, स्क्रिप्ट, एडिटिंग और प्रचार सब कुछ पहले से तय होता है। असुविधाजनक सवालों से बचना आसान होता है और चमकदार वीडियो के जरिए “सकारात्मक छवि” तैयार कर दी जाती है।

स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि पहले जनप्रतिनिधि प्रेस वार्ता करते थे, पत्रकारों से खुलकर बात करते थे और स्थानीय समस्याओं पर जवाब देते थे। लेकिन अब कई नेता सिर्फ अपने सोशल मीडिया पेजों और “फ्रेंडली इन्फ्लुएंसरों” तक सीमित होते जा रहे हैं। जमीन पर मौजूद समस्याओं पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों से दूरी बनाई जा रही है।

व्यापारिक संस्थानों में भी यही प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। कई व्यापारी और संस्थान अब विज्ञापन के बजाय “पेड सोशल मीडिया प्रमोशन” पर ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं। कारण यह माना जा रहा है कि सोशल मीडिया पर आलोचना को दबाना और अपनी छवि नियंत्रित करना आसान होता है। कुछ मामलों में विवादित कारोबारियों और संस्थानों ने भी लोकल इन्फ्लुएंसरों के जरिए खुद को “समाजसेवी” और “जनहितैषी” दिखाने की कोशिश की।

विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक मीडिया की सबसे बड़ी ताकत सवाल पूछना और तथ्य सामने लाना होती है। जबकि सोशल मीडिया प्रचार का बड़ा हिस्सा “इमेज मैनेजमेंट” पर आधारित होता है। यही वजह है कि कई नेता और व्यापारी अब उन मंचों से दूरी बना रहे हैं जहां उनसे जवाबदेही तय हो सकती है।
उत्तर प्रदेश में भी पिछले कुछ वर्षों में यह बदलाव साफ दिखाई दिया है। शहर की टूटी सड़कें, बिजली संकट, अवैध कब्जे, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा कम होती जा रही है, जबकि सोशल मीडिया पर नेताओं की रील्स, फोटोशूट और प्रचार वीडियो लगातार बढ़ रहे हैं।
युवा वर्ग का कहना है कि अब “विकास” कैमरे में ज्यादा और जमीन पर कम दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली चमक और वास्तविक हालात में बड़ा अंतर महसूस किया जा रहा है। कई बार छोटी-सी सफाई या अस्थायी व्यवस्था को “ऐतिहासिक काम” बताकर प्रचारित किया जाता है।
मीडिया विश्लेषकों के अनुसार यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है। अगर जनप्रतिनिधि और संस्थान सवालों से बचकर सिर्फ नियंत्रित प्रचार के जरिए जनता तक पहुंचेंगे, तो पारदर्शिता कमजोर होगी। लोकतंत्र सिर्फ प्रचार से नहीं, जवाबदेही से मजबूत होता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भविष्य में जनता तक सच पत्रकारिता के जरिए पहुंचेगा या सिर्फ पैसों से बनाई गई रील्स और प्रचार वीडियो के जरिए? क्योंकि जब नेता सवालों से दूरी बनाने लगें और व्यापारी सिर्फ अपनी चमकदार छवि दिखाने में लग जाएं, तब जनता और सच्चाई के बीच की दूरी बढ़ना तय है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article