डॉ विजय गर्ग
भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे यह तय करना है कि उसका भविष्य किस दिशा में जाएगा—नीतियों के प्रबंधन की ओर या ज्ञान और नवाचार की ओर। लंबे समय से देश में प्रतिष्ठा, शक्ति और सामाजिक मान-सम्मान का केंद्र रही है भारतीय प्रशासनिक सेवा , जिसे आम तौर पर आईएएस कहा जाता है। दूसरी ओर, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की भूमिका, जो राष्ट्र के दीर्घकालिक विकास की नींव रखते हैं, अपेक्षाकृत कम चर्चित और कम आकर्षक मानी जाती है। यह स्थिति केवल करियर विकल्पों का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का भी प्रतिबिंब है।
प्रतिष्ठा बनाम प्रगति: समाज की प्राथमिकताओं का आईना
भारतीय समाज में आज भी एक प्रतिभाशाली छात्र का अंतिम लक्ष्य अक्सर सिविल सेवा बन जाता है। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा को पास करना सफलता की पराकाष्ठा माना जाता है। परिवार, शिक्षक और समाज भी उसी दिशा में प्रेरित करते हैं।
इसके विपरीत, यदि कोई छात्र विज्ञान में शोध करना चाहता है, तो उसे अक्सर “कम सुरक्षित” या “कम आकर्षक” विकल्प समझा जाता है। यह सोच इस तथ्य को नजरअंदाज करती है कि जिन देशों ने विज्ञान और तकनीक में निवेश किया है, वे ही आज वैश्विक नेतृत्व कर रहे हैं।
वैज्ञानिक: राष्ट्र निर्माण के वास्तविक शिल्पकार
भारत के इतिहास में होमी जहांगीर भाभा, विक्रम साराभाई और ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिकों ने न केवल विज्ञान को आगे बढ़ाया, बल्कि देश की आत्मनिर्भरता की नींव भी रखी।
आज वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद ( सीएसआईआर) की उपलब्धियाँ, सस्ती और सफल अंतरिक्ष मिशनों के रूप में, पूरी दुनिया में भारत की पहचान बना रही हैं। मार्स ऑर्बिटर मिशन इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
वैज्ञानिक केवल प्रयोगशालाओं में सीमित नहीं होते; वे नई तकनीक, दवाइयाँ, ऊर्जा समाधान और औद्योगिक नवाचार पैदा करते हैं—जो किसी भी देश की असली ताकत होते हैं।
प्रशासन की भूमिका: जरूरी लेकिन सीमित
यह कहना गलत होगा कि प्रशासकों की जरूरत नहीं है। आईएएस अधिकारी शासन चलाने, नीतियाँ लागू करने और संसाधनों का प्रबंधन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल है—वे किस चीज का प्रबंधन कर रहे हैं?
यदि देश में नई तकनीक, अनुसंधान और नवाचार नहीं होगा, तो प्रशासन के पास प्रबंधन के लिए भी सीमित संसाधन ही होंगे। दूसरे शब्दों में, वैज्ञानिक “सृजन” करते हैं और प्रशासक “प्रबंधन”।
शिक्षा व्यवस्था की चुनौती
भारत की शिक्षा प्रणाली अभी भी रटने और परीक्षा-उन्मुख दृष्टिकोण पर आधारित है। स्कूलों और कॉलेजों में शोध की संस्कृति कमजोर है।
वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद ( सीएसआईआर), तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान
जैसे संस्थान उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या और पहुंच अभी भी सीमित है।
अधिकांश छात्र विज्ञान को “अंक प्राप्त करने का विषय” मानते हैं, न कि “खोज और जिज्ञासा का माध्यम”। यही कारण है कि बहुत कम छात्र वैज्ञानिक बनने का सपना देखते
ब्रेन ड्रेन: प्रतिभा का पलायन
भारत के कई प्रतिभाशाली छात्र उच्च शिक्षा और शोध के लिए विदेश चले जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण है—देश में शोध के सीमित अवसर, कम वेतन और अपर्याप्त संसाधन।
अमेरिका, जर्मनी और अन्य विकसित देश वैज्ञानिकों को बेहतर सुविधाएँ और सम्मान देते हैं। परिणामस्वरूप, भारत अपनी ही प्रतिभा को खो देता है।
नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था की आवश्यकता
21वीं सदी ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की सदी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी, क्वांटम कंप्यूटिंग और क्लाइमेट साइंस जैसे क्षेत्र भविष्य को आकार दे रहे हैं।
यदि भारत को वैश्विक शक्ति बनना है, तो उसे इन क्षेत्रों में नेतृत्व करना होगा। यह केवल प्रशासकों से संभव नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के सामूहिक प्रयास से ही संभव है।
सामाजिक मानसिकता में बदलाव
जब तक समाज में वैज्ञानिकों को उतना ही सम्मान नहीं मिलेगा जितना एक आईएएस अधिकारी को मिलता है, तब तक यह संतुलन नहीं बदलेगा।
मीडिया, शिक्षा प्रणाली और सरकार—तीनों को मिलकर यह संदेश देना होगा कि:
वैज्ञानिक बनना भी उतना ही प्रतिष्ठित है
शोध भी एक सशक्त करियर विकल्प है
असफलता, खोज का एक हिस्सा है
नीति स्तर पर सुधार
सरकार को चाहिए कि:
शोध एवं विकास पर अधिक निवेश करे
वैज्ञानिकों को बेहतर वेतन और सुविधाएँ दे
विश्वविद्यालयों में रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाए
उद्योग और अकादमिक जगत के बीच सहयोग बढ़ाए
निष्कर्ष: संतुलन नहीं, प्राथमिकता का सवाल
भारत को प्रशासकों की जरूरत है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरत है वैज्ञानिकों की। क्योंकि प्रशासक वर्तमान को संभालते हैं, जबकि वैज्ञानिक भविष्य बनाते हैं।
यदि हम एक सशक्त, आत्मनिर्भर और नवाचार-प्रधान भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपने युवाओं को प्रयोगशालाओं की ओर प्रेरित करना होगा, न कि केवल कार्यालयों की ओर।
यह समय है कि हम अपने बच्चों से पूछें—
“तुम आईएएस क्यों बनना चाहते हो?”
और साथ ही यह भी कहें—
“तुम वैज्ञानिक क्यों नहीं बन सकते?”
यही प्रश्न भारत के भविष्य को नई दिशा दे सकता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


