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Thursday, April 23, 2026

बढ़ते तापमान के बीच संकट में खेती: चुनौतियाँ और समाधान

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डॉ विजय गर्ग
जलवायु परिवर्तन आज केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि खेती-किसानी के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। लगातार बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, लू की तीव्रता और बदलते मौसम चक्र ने किसानों की पारंपरिक समझ और अनुभव को भी चुनौती दे दी है। जो खेती कभी मौसम की लय पर चलती थी, आज अनिश्चितताओं के बोझ तले डगमगा रही है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खेती सीधे तौर पर मौसम पर निर्भर करती है। लेकिन अब तापमान में लगातार वृद्धि फसलों की उत्पादकता को प्रभावित कर रही है। गेहूं, धान, मक्का जैसी प्रमुख फसलें उच्च तापमान के प्रति संवेदनशील होती हैं। उदाहरण के लिए, गेहूं की फसल को पकने के समय ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है, लेकिन यदि इस अवधि में तापमान अचानक बढ़ जाए तो दाने सिकुड़ जाते हैं और उत्पादन घट जाता है।

इसके साथ ही, हीटवेव (लू) की बढ़ती घटनाएँ न केवल फसलों को नुकसान पहुँचा रही हैं, बल्कि खेतों में काम करने वाले किसानों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। मिट्टी की नमी तेजी से घटती है, जिससे सिंचाई की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में जिन क्षेत्रों में पहले से ही पानी की कमी है, वहाँ स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।

बढ़ते तापमान का असर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेती की लागत भी बढ़ा रहा है। अधिक सिंचाई, उर्वरकों और कीटनाशकों की बढ़ती जरूरत किसानों के खर्च को बढ़ा देती है, जबकि उत्पादन में कमी से आय घटती है। इस दोहरे दबाव के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है।

इसके अलावा, मौसम की अनिश्चितता ने बुवाई और कटाई के समय को भी प्रभावित किया है। कभी बारिश समय से पहले हो जाती है, तो कभी लंबे समय तक सूखा पड़ता है। इससे फसल चक्र बिगड़ जाता है और किसानों के लिए सही निर्णय लेना कठिन हो जाता है। पारंपरिक कृषि ज्ञान, जो पीढ़ियों से चला आ रहा था, अब बदलते मौसम के सामने पर्याप्त नहीं रह गया है।

इस संकट से निपटने के लिए कई स्तरों पर प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले, जलवायु-लचीली (climate-resilient) कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा। सूखा-रोधी और कम समय में तैयार होने वाली फसल किस्मों का विकास और उपयोग जरूरी है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि पानी का अधिक कुशल उपयोग हो सके।

सरकार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसानों को समय पर मौसम की सटीक जानकारी, फसल बीमा और उचित समर्थन मूल्य जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करानी होंगी। साथ ही, कृषि अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना होगा ताकि बदलते जलवायु के अनुरूप नई तकनीकें विकसित की जा सकें।
कृषि को भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, लेकिन आज यही रीढ़ ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के ताप से झुलस रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान में मात्र 1°C से 2°C की वृद्धि भी फसलों की पैदावार को *15% से 20%* तक कम कर सकती है।
### *1. प्रमुख चुनौतियाँ और प्रभाव*
* *फसलों का समय से पहले पकना:* तापमान बढ़ने से गेहूं जैसी फसलें अपनी प्राकृतिक अवधि से पहले ही पकने लगती हैं। इसे ‘टर्मिनल हीट स्ट्रेस’ कहा जाता है। इससे दाना छोटा और हल्का रह जाता है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
* *जल संकट और सिंचाई की बढ़ती मांग:* गर्मी के कारण मिट्टी की नमी तेजी से खत्म होती है । इसके परिणामस्वरूप फसलों को सामान्य से अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है, जिससे भूजल स्तर पर दबाव बढ़ता है।
* *कीटों और रोगों का प्रकोप:* गर्म वातावरण कई प्रकार के कीटों के पनपने के लिए अनुकूल होता है। अध्ययन बताते हैं कि तापमान बढ़ने से कीटों की चयापचय दर बढ़ जाती है, जिससे वे फसलों को अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।
* *बागवानी और नकदी फसलों पर असर:* आम, लीची और नींबू जैसे फलों में ‘सन-बर्न’ की समस्या देखी जा रही है। साथ ही, कॉफी और आलू जैसी फसलों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों प्रभावित हो रही हैं।
### *2. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव*
भारत में लगभग *80% किसान छोटे और सीमांत* हैं। फसल खराब होने का सीधा अर्थ है—आय में कमी और कर्ज का बोझ। जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि क्षेत्र को होने वाला नुकसान देश की जीडीपी को भी प्रभावित कर रहा है।
### *3. समाधान: जलवायु-अनुकूल कृषि *
इस संकट से निपटने के लिए अब पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव अनिवार्य हो गया है:
* *ताप-सहनशील किस्मों का चयन:* भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और अन्य संस्थान ऐसी बीज किस्में विकसित कर रहे हैं जो उच्च तापमान को सहन कर सकें। किसानों को इन नई किस्मों (जैसे गेहूं की किस्में) को अपनाना होगा।
* *मल्चिंग ) तकनीक:* खेत में फसल अवशेषों की परत बिछाने से मिट्टी की नमी सुरक्षित रहती है और तापमान नियंत्रित रहता है।
* *सूक्ष्म सिंचाई :* ‘कम पानी, अधिक फसल’ के सिद्धांत पर चलते हुए ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा देना चाहिए ताकि पानी की एक-एक बूंद का सही इस्तेमाल हो।
* *जैविक खाद का उपयोग:* रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद और वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाता है।
* *फसल विविधीकरण:* केवल गेहूं-धान के चक्र से निकलकर ऐसी फसलें उगानी होंगी जो कम पानी और विषम मौसम में भी जीवित रह सकें, जैसे मोटे अनाज

अंततः, बढ़ते तापमान के इस दौर में खेती को बचाना केवल किसानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट खाद्य सुरक्षा तक पहुँच सकता है। इसलिए, आवश्यक है कि हम खेती को अधिक टिकाऊ, लचीला और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सशक्त बनाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए अन्न का आकाश सुरक्षित रह सके।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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