
प्रशांत कटियार
भारत में महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है, लेकिन हाल ही में संसद में पेश संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 ने इस बहस को और तेज कर दिया है। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और कई सामाजिक समूह इसे अधूरा और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित मान रहे हैं।
तीन दिवसीय विशेष सत्र में इस बिल को पास कराने की कोशिश की गई, लेकिन यह आवश्यक दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। कुल 528 वोटों में से 298 पक्ष में और 230 विरोध में पड़े, जबकि इसे पास होने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी। इस तरह बिल 54 वोटों से गिर गया और
इस पूरे मुद्दे का सबसे बड़ा विवाद यह है कि प्रस्तावित महिला आरक्षण में SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं की गई है। विरोध करने वालों का कहना है कि अगर आरक्षण दिया जाना है तो वह सामाजिक न्याय के आधार पर होना चाहिए, ताकि हर वर्ग की महिलाओं को बराबरी का प्रतिनिधित्व मिल सके। बिना वर्गीय संतुलन के यह आशंका जताई जा रही है कि इसका लाभ मुख्यतः एक सीमित वर्ग तक ही सिमट सकता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का है। वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं, जिन्हें बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव सामने आया है। सरकार का तर्क है कि बढ़ती आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व बढ़ाना जरूरी है, लेकिन अगर 33% आरक्षण देना ही उद्देश्य है तो इसे मौजूदा सीटों में ही लागू किया जा सकता है। सीटें बढ़ाने से देश पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा नए सांसदों के वेतन, भत्ते, सुरक्षा, कार्यालय, चुनाव खर्च और पेंशन जैसी सुविधाओं पर हर साल हजारों करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च होने की संभावना है।
इसके साथ ही परिसीमन का मुद्दा भी इस बहस के केंद्र में है। परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों की संख्या तय की जाती है। भारत में अब तक 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग का गठन हो चुका है। वर्तमान प्रस्ताव में कहा गया है महिला आरक्षण को लागू करने के लिए नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन जरूरी होगा। यही कारण है कि इस कानून के लागू होने में देरी की आशंका भी जताई जा रही है।
दक्षिण भारत के कई राज्यों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका तर्क है कि यदि सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर होगा, तो उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी और दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाएगा। उनका कहना है कि परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन करने का उन्हें नुकसान नहीं होना चाहिए।
इसी बहस के बीच देश में दलित और पिछड़े वर्गों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हाल के समय में लाए गए यूजीसी से जुड़े प्रावधानों और नीतियों को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। कई स्थानों पर सामान्य वर्ग के लोगों द्वारा तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और आंदोलन हुए, हद तो तब हो गई जब उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री पर भी गलत टिप्पणी करने से गुरेज नहीं किया।जिससे सामाजिक असंतोष का माहौल बना। बाद में इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप भी हुआ और सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट किया कि जब तक नीतियों में सभी वर्गों की भागीदारी और विश्वास नहीं होगा, तब तक ऐसे विवाद लगातार सामने आते रहेंगे।
विपक्ष का एक बड़ा सवाल यह भी है कि यह बिल महिलाओं के सशक्तिकरण से ज्यादा देश के राजनीतिक नक्शे को बदलने की कोशिश है। उनका कहना है कि पहले जातीय जनगणना और सामान्य जनगणना कराई जानी चाहिए, ताकि वास्तविक आबादी के आधार पर सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।
इतिहास पर नजर डालें तो महिला आरक्षण का विचार नया नहीं है। 1993 में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू किया गया था, जिससे लाखों महिलाओं को राजनीति में आने का मौका मिला। 2010 में भी महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक राज्यसभा में पास हुआ था, लेकिन लोकसभा में अटक गया। 2023 में एक बार फिर यह कानून पारित हुआ, लेकिन उसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया, जिससे इसका लागू होना टल गया।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महिला आरक्षण का उद्देश्य सच में महिलाओं को बराबरी देना है या फिर यह एक राजनीतिक रणनीति बनकर रह गया है। अगर महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व देना है, तो जरूरी है कि इसमें सभी वर्गों—SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक—की महिलाओं को उनकी आबादी के अनुसार हिस्सेदारी दी जाए। साथ ही, जनगणना और पारदर्शी परिसीमन के बिना कोई भी व्यवस्था अधूरी मानी जाएगी।
सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण तभी संभव है जब आरक्षण सिर्फ संख्या बढ़ाने का माध्यम न बनकर, समाज के हर वर्ग की महिलाओं को आगे लाने का साधन बने। वरना यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि यह बिल महिलाओं के हक के लिए था या राजनीति के लिए।
लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के स्टेट हेड हैं।


