यूजीसी एक्ट 2026 को लेकर देश की यूनिवर्सिटीज ‘सोशल चर्निंग’ से गुजर रही है. इस एक्ट के आने पर ‘सवर्ण हिन्दू’ जमात ने एक ‘स्क्रिप्टड़ विरोध’ दर्ज कराया। कॉर्पोरेट मीडिया, सवर्ण सिविल सोसाइटी, सोसल इलीट और फाइनली न्यायपालिका के रुख से सवर्ण हिन्दू की एकजुटता सामने आयी।
इस एक्ट को लेकर
सवर्ण जमात के कुछ सवाल थे जिसे लेकर विरोध प्रदर्शन किया गया. हालांकि एक्ट को सही ढंग से पढ़ा नहीं गया, उसमे कुछ सुधार हो ही सकते है. लेकिन विरोध प्रदर्शन मे जो भाषा, बॉडी लैंगेज दिखी, उससे ‘बहुजन हिन्दू’ ने ध्यान से देखा. कुछ सवर्ण युटुबरों ने तो सीधा प्रधानमंत्री मोदी को उनकी जाति को लेकर कटाक्ष किया कि वो तेली है इसलिए सवर्णों का अहित कर रहे है. सवर्ण इलीट के एक दुलारे ने तो कैबिनेट मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जाति-विशेष की गालियां दी. इस पूरे प्रकरण मे एक नये तरीके के ‘वल्गर-लूंपन’ सवर्ण एकजुटता को देखा गया. जिसे बहुत ध्यान से देखा गया।
हालांकि इस एकजुटता ने बहुजन हिन्दुओ को एलर्ट भी किया।
इस एक्ट ने भाजपा और आरएसएस के हिन्दू-एकता की फाल्टलाइन भी उजागर किया. भाजपा और आरएसएस मे भी बहुजन हिन्दुओ मे नाराजगी साफ दिख रही है।
यूजीसी एक्ट के समर्थन मे विपक्ष मे एकमात्र लेफ्ट पार्टीज समर्थन मे खड़ी हुयी।आजाद समाज पार्टी ने खुलकर समर्थन जताया. यूपी मे ओबीसी वर्ग की नयी पार्टी जनहित विकल्प पार्टी ने इस एक्ट को लेकर गाँव-गांव कैंपेन चलाने की बात रही।
वही विपक्ष मे कांग्रेस इस मामले मे फंस गयी. कांग्रेस की छात्र विंग NSUI ने यूजीसी एक्ट के विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन किया. उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने तो अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से विरोध प्रदर्शन को ट्वीट भी किया. एक्ट को लेकर कांग्रेस का ये रुख राहुल गाँधी के दलित-पिछडो के मुद्दे पर उनकी बन रही इमेज को पलीता लगा दिया।
वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जरवेशन को सही ठहराया और एक तरीके से मैसेज गया कि कि सपा और बीएसपी एक्ट के विरोध में है, और सवर्ण हिन्दुओ के वोट पाने की आशा कर रहे है।
सपा कांग्रेस और बीएसपी का यूजीसी एक्ट को लेकर लिया गया स्टैंड बहुजन हिंदुओं के बीच गुस्से की वजह बना।अब इस समय पूरे देश में यूजीसी एक्ट के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं. यूनिवर्सिटी प्रशासन, पुलिस और छात्रों के बीच लगातार कश्म-कश जारी है.
कई जगह प्रदर्शन करने वाले छात्रों को ऊपर नकेल कसी गई है. जेएनयू में तो पूरे छात्र संघ को ही रस्टिकेट कर दिया गया।
यूजीसी एक्ट को लेकर अब पूरे देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में प्रदर्शन हो रहे हैं. एक्ट के समर्थकों अब विपक्षी पार्टियों के भरोसे नहीं बैठे है।
अच्छी बात यह हुई कि अब बहुजन हिंदू अब खुद अपनी लड़ाई लड़ने लगे. खासकर ओबीसी वर्ग जो सन 1990 में मंडल-I और सन 2008 मे मंडल-II के समय प्रमुख रूप से सड़क पर नहीं आया था, उन आंदोलन को नेतृत्व दलित समाज ने दिया था।
इस बार ओबीसी वर्ग खुद मैदान पर आया है हालांकि इस बार भी दलित समाज ही नेतृत्व कर रहा है।
मै इसे भारतीय राजनीति में एक नया आगाज की तरह देख रहा हूँ. बहुजन हिन्दुओ ने पहली बार एक ‘बहुजन सिविल सोसाइटी’ की आवश्यकता महसूस किया.एक सिविल सोसाइटी का निर्माण डॉक्टर,इंजीनियर शिक्षक, एक्टिविस्ट से होता है इस मुद्दे ने ओबीसी के अंदर सिविल सोसाइटी की आवश्यकता को महसूस करवाया है।
हालांकि इस मामले में कोर्ट ने जो ऑब्जरवेशन दिया है उस पर भाजपा को फैसला लेना पड़ेगा. आगामी 19 मार्च को माननीय कोर्ट यदि यूजीसी एक्ट के विरोध में फैसला देता है और सरकार की तरफ से पैरवी नहीं हुयी तो भाजपा के चिंता का विषय होगा. बहुजन हिंदुओं के बीच भयानक नाराजगी फैलेगी।बहुजन हिन्दुओ के बीच भाजपा को लेकर एक शंका घर कर जायेगी. भाजपा को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव मे संविधान और आरक्षण के मसले पर जो डेंट हुआ है, वो और बढ़ सकता है।
भाजपा तो अभी वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हो सकती है लेकिन इस एक्ट के समर्थन में संसद में भी कानून बना सकती या नहीं, यह अभी कहना उचित नहीं है.
बाहरहाल इस पूरे प्रकरण को बहुजन हिन्दुओ की सिविल सोसाइटी के भविष्य की तरह देखता हूं क्योंकि किसी भी समाज का बेहतर विकास मे सिविल सोसाइटी की बड़ी भूमिका होती है.
हम वर्ष 1990 से इसे देख रहे हैं. इस एक्ट का भविष्य कुछ भी हो. इसके चलते बहुजन हिन्दुओ मे एक सिविल सोसाइटी के निर्माण की नींव रख दी है।
– डा. अनूप पटेल (JNU)






