आगरा
चंबल नदी में लुप्तप्राय बटागुर कछुओं के संरक्षण की दिशा में बड़ी सफलता मिली है। मंगलवार को चंबल नदी में 634 नन्हे बटागुर कछुओं को सुरक्षित छोड़ा गया, जिससे वन विभाग और पर्यावरण प्रेमियों में उत्साह का माहौल है। इनमें ढोर और साल प्रजाति के कछुओं के बच्चे शामिल हैं। पिछले एक सप्ताह में कुल 1214 नन्हे कछुए चंबल नदी में छोड़े जा चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चंबल का स्वच्छ और अनुकूल वातावरण इन दुर्लभ कछुओं के संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।
वन विभाग के अनुसार बटागुर कछुए दुनिया में तेजी से लुप्त होती प्रजातियों में शामिल हैं, लेकिन चंबल नदी का पारिस्थितिकी तंत्र इनके जीवन और प्रजनन के लिए सुरक्षित माना जा रहा है। कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि मंगलवार को नंदगवा घाट पर 534 और दूसरे घाट पर 100 कछुओं के बच्चों को नदी में छोड़ा गया। इस दौरान वन दरोगा राहुल जादौन, राजेश कुमार, चंद्रभान और टिंकू की टीम ने कछुओं को सुरक्षित नदी तक पहुंचाया। वन विभाग की निगरानी में इन बच्चों को हैचिंग के बाद सावधानीपूर्वक नदी में छोड़ा गया, ताकि उनका प्राकृतिक जीवन सुरक्षित रह सके।
वन अधिकारियों ने बताया कि फरवरी और मार्च के दौरान कछुओं की नेस्टिंग हुई थी। मई के पहले सप्ताह में हैचिंग पीरियड शुरू होने पर अंडों की सुरक्षा के लिए लगाए गए जाल हटाए गए। यह जाल सियार और अन्य जंगली जानवरों से अंडों की रक्षा के लिए लगाए जाते हैं। जाली हटने के बाद मादा कछुए बालू को कुरेदकर अंडों को सुरक्षित रखती हैं और उन्हें सेती हैं। जैसे ही अंडों से बच्चे बाहर आते हैं, वन विभाग की टीम उन्हें इकट्ठा कर सुरक्षित तरीके से नदी में छोड़ती है। विभाग द्वारा नेस्टिंग स्थलों की दिन-रात निगरानी की जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार ढोर प्रजाति के कछुए अब केवल चंबल नदी में ही बचे हैं, जबकि साल प्रजाति के लगभग 98 प्रतिशत कछुए चंबल में और शेष गंगा व यमुना नदी में पाए जाते हैं। ऐसे में चंबल नदी इन दुर्लभ जीवों के अस्तित्व के लिए बेहद अहम बन गई है। लगातार बढ़ती संख्या को वन विभाग संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता मान रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यदि इसी तरह संरक्षण कार्य जारी रहा तो आने वाले वर्षों में बटागुर कछुओं की संख्या में और वृद्धि देखने को मिल सकती है।


