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Thursday, April 9, 2026

सत्ता पर फिर छाया सैन्य साया, नए कैबिनेट में पूर्व जनरलों का दबदबा

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– लोकतांत्रिक उम्मीदों को झटका

म्यांमार। संसद द्वारा नए कैबिनेट को मंजूरी दिए जाने के बाद देश की राजनीति में एक बार फिर सैन्य प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है। नई सरकार में अधिकांश पदों पर पूर्व सैन्य अधिकारियों और पिछली सैन्य सरकार से जुड़े चेहरों की नियुक्ति ने नागरिक शासन की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है।

संसद के इस फैसले को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। आलोचकों का कहना है कि यह कदम लोकतंत्र की दिशा में पीछे जाने जैसा है, जहां सत्ता का केंद्रीकरण फिर से सेना के हाथों में होता नजर आ रहा है।

नई कैबिनेट सूची में शामिल अधिकांश मंत्री वे हैं, जो पहले सेना में उच्च पदों पर रह चुके हैं या पूर्व सैन्य शासन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि सत्ता संरचना में वास्तविक बदलाव की गुंजाइश बेहद सीमित है।

विशेष रूप से सेना प्रमुख Min Aung Hlaing का राष्ट्रपति पद की शपथ लेना इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। उनके नेतृत्व में सेना पहले भी देश की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रख चुकी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की नियुक्तियां म्यांमार में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती हैं। यह आशंका भी जताई जा रही है कि आने वाले समय में नागरिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता पर और अधिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

विपक्षी समूहों और लोकतंत्र समर्थकों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे जनता की आकांक्षाओं के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि यह कदम देश को फिर से सैन्य शासन की ओर धकेल सकता है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें भी इस घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। कई देशों और मानवाधिकार संगठनों ने पहले ही म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की मांग की है और इस नए कैबिनेट को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है।

हालांकि, सरकार समर्थकों का तर्क है कि यह नियुक्तियां स्थिरता और प्रशासनिक अनुभव को ध्यान में रखते हुए की गई हैं। उनका कहना है कि देश की वर्तमान परिस्थितियों में अनुभवी नेतृत्व की आवश्यकता है।

इसके बावजूद आम जनता के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कई लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या यह सरकार वास्तव में नागरिक हितों को प्राथमिकता देगी या फिर सैन्य एजेंडे को आगे बढ़ाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सत्ता में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी बनी रहती है, तो इससे देश में असंतोष और अस्थिरता बढ़ सकती है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का विश्वास जीतना होगी।

म्यांमार का यह राजनीतिक घटनाक्रम दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति पर भी असर डाल सकता है। क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक संबंधों पर इसके प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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