वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर विवादित बयान देकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज कर दी है। ईरान के साथ हालिया संघर्ष विराम के बाद ट्रंप ने सैन्य गठबंधन पर तीखा हमला बोला और सहयोग की कमी पर सवाल उठाए।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर कहा कि “सैन्य गठबंधन हमारे साथ तब नहीं था जब हमें उनकी जरूरत थी।” उन्होंने तंज कसते हुए कहा—“ग्रीनलैंड को याद रखें, वह बड़ा लेकिन खराब तरीके से संचालित बर्फ का टुकड़ा है।”
Greenland (ग्रीनलैंड), जो Denmark (डेनमार्क) के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, लंबे समय से अमेरिका की रणनीतिक नजर में रहा है। ट्रंप पहले भी इस क्षेत्र को खरीदने या अपने प्रभाव में लेने की इच्छा जता चुके हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति और खनिज संसाधन इसे वैश्विक राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और Russia (रूस) तथा China (चीन) के प्रभाव के बीच इसकी अहमियत और बढ़ गई है।
ट्रंप ने सैन्य गठबंधन पर भी खुलकर निशाना साधा। उनका कहना है कि ईरान के साथ तनाव के दौरान कई सहयोगी देशों ने अमेरिका का अपेक्षित साथ नहीं दिया।
उन्होंने एक प्रेस वार्ता में Japan (जापान), Australia (ऑस्ट्रेलिया), South Korea (दक्षिण कोरिया) और अन्य सहयोगी देशों का जिक्र करते हुए कहा कि ये सभी देश उस समय अमेरिका के साथ मजबूती से खड़े नहीं हुए।
ट्रंप के इस बयान से यूरोप में चिंता का माहौल बन गया है। France (फ्रांस) और Germany (जर्मनी) जैसे देशों ने पहले ही सुरक्षा मामलों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है।
यूरोपीय नेताओं ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला वहां की जनता ही करेगी और किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह भी ध्यान देने योग्य है कि हाल ही में अमेरिका और Iran (ईरान) के बीच अस्थायी युद्धविराम हुआ है, जिससे क्षेत्र में तनाव कुछ हद तक कम हुआ है।
बताया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत Pakistan (पाकिस्तान) की राजधानी इस्लामाबाद में हो सकती है, जो इस कूटनीतिक प्रक्रिया का अगला महत्वपूर्ण चरण होगा।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के बयान केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं हैं, बल्कि वे अमेरिका की बदलती विदेश नीति और वैश्विक रणनीति का संकेत भी देते हैं।
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड पर टिप्पणी और सहयोगियों पर हमले ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में अमेरिका और उसके साझेदार देशों के रिश्तों में और खटास आ सकती है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।


