
लेखक: सूर्या पंडित
समय समय की बात है, समय समय का योग,
लाखों में बिकने लगे, दो कौड़ी के लोग।
कल तक जो थे धूल में, वह आज बने हैं ताज,
चापलूसी के खेल ने, बदले सारे राज।
हमने भी गर सीख ली होती चाटुकारों की रीत
आज हमारे हाथों में होती दुनिया की प्रीत
गर झुकना हमको आता और बिकना भी आता
शायद यह जमाना हमको भी अपनाता
जो मेरे दम पर जीते थे वो बन बैठे है बॉस
कल तक जो थे मेरे अब और किसी के खास
वह भी तू तुम करते हैं अब जो कहते थे आप
जिन्हें अपना समझ के पाला था वो थे जहरीले सांप
ये समय का दस्तूर है सब बदल जाएगा रंग
जो किया है तूने मेरे संग वह होगा तेरे संग
झूठ और छल कपट की राह है कुछ पल की भीख
अंत में होती है बस सच की ही जीत
आज वक्त ने हमको गर थोड़ा सा तोड़ दिया
पर शेर वही कहलाया जिसने इसको मोड़ दिया
हौसलों की चिंगारी से हम सच की आग जलाएंगे
तब दो कौड़ी के लोगों को हम आईना दिखलाएं गे
समय समय की बात है समय-समय का योग
जब वक्त का पहिया घूमेगा तब समझ जाएंगे लोग
जो ऊंचे ऊंचे महल बने वह बन जाएंगे रेत
फिर पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत
तेरे अपने भी कह जाएंगे यह है कर्मों का भोग
समय-समय की बात है समय-समय का योग
लाखों में बिकने लगे अब दो कौड़ी लोग
लाखों में बिकने लगे अब दो कौड़ी के लोग।।
(लेखक यूथ इंडिया न्यज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।)


