दुबई/दोहा/मनीला।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों एशियाई प्रवासी मजदूरों को गहरे संकट में डाल दिया है। West Asia Conflict के चलते उनके सामने अब रोज़गार और जिंदगी में से किसी एक को चुनने की मजबूरी खड़ी हो गई है।
अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव का सीधा असर खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, जहां बड़ी संख्या में एशियाई मजदूर काम करते हैं। ये मजदूर अब लगातार बढ़ते खतरे और अनिश्चितता के बीच जीने को मजबूर हैं।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिसाइल हमलों, सायरनों और युद्ध के खतरे के बीच काम कर रहे इन मजदूरों के पास सुरक्षित विकल्प बेहद सीमित हैं। वे अपने परिवारों के लिए कमाई जारी रखने और अपनी जान बचाने के बीच उलझे हुए हैं।
International Labour Organization के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम एशिया में करीब 2.4 करोड़ प्रवासी मजदूर काम कर रहे हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा श्रम प्रवासन केंद्र माना जाता है।
इनमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, फिलीपीन और इंडोनेशिया जैसे देशों के श्रमिक बड़ी संख्या में शामिल हैं। खाड़ी की अर्थव्यवस्था में इनकी भूमिका बेहद अहम है, लेकिन संकट के समय यही सबसे ज्यादा असुरक्षित नजर आते हैं।
कतर में घरेलू कामगार के रूप में काम कर रहीं नोर्मा टैक्टाकॉन जैसी लाखों महिलाएं रोज डर के साये में जी रही हैं। उनके परिवार पूरी तरह उनकी कमाई पर निर्भर हैं, जिससे वे चाहकर भी तुरंत घर नहीं लौट पा रहीं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक कम से कम 12 दक्षिण एशियाई मजदूरों की जान जा चुकी है। कई लोग घायल हुए हैं और अनेक ऐसे हैं जो हमलों के बीच फंसे हुए हैं।
तेल अवीव में एक फिलीपीनी केयरगिवर मैरी एन वेलास्केज उस समय घायल हो गईं जब एक बैलिस्टिक मिसाइल उनके अपार्टमेंट पर गिरी। वहीं, अबू धाबी में काम कर रहे नेपाल के एक सुरक्षा गार्ड की भी हमले में मौत हो गई।
दुबई में एक बांग्लादेशी मजदूर की जान इंटरसेप्टेड मिसाइल के मलबे से चली गई। उनके परिवार का कहना है कि उन्हें युद्ध की गंभीरता का अंदाजा तक नहीं था।
ये घटनाएं इस बात को उजागर करती हैं कि खाड़ी देशों में काम कर रहे प्रवासी मजदूर किस तरह युद्ध की सीधी मार झेल रहे हैं, जबकि वे किसी भी राजनीतिक फैसले का हिस्सा नहीं होते।
आर्थिक मजबूरी भी इन मजदूरों को वहीं रोके हुए है। खाड़ी देशों में मिलने वाला वेतन उनके अपने देशों की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है, जिससे उनके परिवारों की आजीविका चलती है।
कम वेतन, अस्थिर नौकरी और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद ये मजदूर अपने परिवारों के बेहतर भविष्य के लिए जोखिम उठाने को मजबूर हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो न केवल इन मजदूरों की जिंदगी खतरे में पड़ेगी, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और श्रम बाजार पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा।


