वाशिंगटन: अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर 1971 के ऐतिहासिक घटनाक्रम को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया गया है, जिसमें 1971 में बंगाली हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को आधिकारिक तौर पर ‘नरसंहार’ घोषित करने की मांग की गई है।
यह प्रस्ताव अमेरिकी सांसद ग्रेग लैंड्समैन द्वारा पेश किया गया है। उन्होंने मांग की है कि उस समय हुए अत्याचारों को न केवल युद्ध अपराध बल्कि मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध के रूप में मान्यता दी जाए।
प्रस्ताव में 25 मार्च 1971 की उस रात का विशेष उल्लेख किया गया है, जब तत्कालीन पाकिस्तान सरकार ने शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया था। इसके तुरंत बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की गई।
इस सैन्य अभियान को ऑपरेशन सर्चलाइट के नाम से जाना जाता है। प्रस्ताव में कहा गया है कि इस अभियान के दौरान आम नागरिकों को निशाना बनाया गया और बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं।
अमेरिकी प्रस्ताव में यह भी आरोप लगाया गया है कि उस समय पाकिस्तानी सेना और उसके सहयोगी संगठनों ने विशेष रूप से हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया। इसमें धार्मिक पहचान के आधार पर हमले किए जाने का जिक्र है।
प्रस्ताव में पुराने अमेरिकी दस्तावेजों का भी हवाला दिया गया है। इसमें आर्चर ब्लड द्वारा भेजे गए टेलीग्राम का उल्लेख है, जिसमें उन्होंने उस समय की घटनाओं को “चुनिंदा नरसंहार” बताया था।
28 मार्च 1971 को भेजे गए इस संदेश में कहा गया था कि ढाका और आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हिंसा हो रही है और खास तौर पर बंगालियों तथा हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है।
इसके बाद 6 अप्रैल 1971 को भेजा गया दूसरा संदेश, जिसे ब्लड टेलीग्राम कहा जाता है, उस समय अमेरिकी प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठाता है। इस पर ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास के कई अधिकारियों के हस्ताक्षर थे।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि उस दौर में राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों, डॉक्टरों और छात्रों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। महिलाओं के खिलाफ भी व्यापक हिंसा और उत्पीड़न की घटनाएं सामने आईं।
सांसद लैंड्समैन ने अमेरिकी राष्ट्रपति से अपील की है कि वे इन घटनाओं को आधिकारिक रूप से ‘नरसंहार’ के रूप में मान्यता दें। उनका कहना है कि इससे इतिहास के इस दर्दनाक अध्याय को न्याय और पहचान मिल सकेगी।
विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव केवल ऐतिहासिक मान्यता का मामला नहीं है, बल्कि इससे दक्षिण एशिया की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।
यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, बांग्लादेश और भारत जैसे देशों में इस मुद्दे को लेकर नई चर्चा शुरू हो सकती है।
फिलहाल यह प्रस्ताव अमेरिकी संसद की विदेश मामलों की समिति के पास भेजा गया है, जहां इस पर आगे चर्चा होगी। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका आधिकारिक तौर पर 1971 की इन घटनाओं को ‘नरसंहार’ के रूप में मान्यता देता है या नहीं।


