पटना (शरद कटियार)। बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। स्वास्थ्य कारणों के चलते मुख्यमंत्री पद छोड़ने की चर्चाओं के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या नीतीश कुमार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से भी हटेंगे? लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसा होना मुश्किल है, क्योंकि बीते वर्षों की घटनाओं ने उन्हें अधिक सतर्क बना दिया है।
दरअसल, नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक करियर में कई बार उत्तराधिकारी तय करने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें निराशा हाथ लगी। सबसे पहले उन्होंने उपेन्द्र कुशवाहा को आगे बढ़ाया और उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां सौंपीं। लेकिन समय के साथ दोनों के बीच मतभेद बढ़े और यह प्रयोग सफल नहीं हो सका।
इसके बाद उन्होंने अपने करीबी माने जाने वाले आरसीपी सिंह पर भरोसा जताया। एक समय ऐसा था जब आरसीपी सिंह को उनका सबसे विश्वसनीय सहयोगी माना जाता था। लेकिन राज्यसभा और केंद्रीय मंत्री पद को लेकर पार्टी के भीतर विवाद और नेताओं के बीच टकराव के चलते यह समीकरण भी बिगड़ गया, जिससे नीतीश कुमार का भरोसा दूसरी बार टूटा।
तीसरे प्रयास में नीतीश कुमार ने पारंपरिक राजनीति से हटकर एक बड़ा दांव खेला और प्रशांत किशोर को पार्टी में अहम स्थान दिया। उन्हें संगठन में शीर्ष स्तर पर लाया गया, लेकिन विचारधारा और कार्यशैली के मतभेदों के कारण यह प्रयोग भी ज्यादा समय तक नहीं चल सका।
इन लगातार असफल प्रयासों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने नीतीश कुमार को काफी सतर्क बना दिया है। यही वजह है कि अब उन्होंने अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में आने की अनुमति दी है। हालांकि, वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि निशांत को सही मार्गदर्शन और संरक्षण मिले, ताकि वे लंबे समय तक राजनीति में टिक सकें।
विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण है कि नीतीश कुमार राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। वे संगठन की कमान अपने हाथ में रखकर दिल्ली से पार्टी को मजबूत करने और नए नेतृत्व को तैयार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, बीते वर्षों की राजनीतिक घटनाओं और असफल प्रयोगों ने नीतीश कुमार को यह सिखाया है कि पार्टी की कमान अपने हाथ में रखना ही फिलहाल सबसे सुरक्षित और प्रभावी विकल्प है, ताकि भविष्य में किसी तरह की अनिश्चितता से बचा जा


