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Sunday, March 15, 2026

मासिक धर्म अवकाश पर राष्ट्रीय नीति की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (पीरियड लीव) को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि इसे कानून के जरिए अनिवार्य बनाना कई सामाजिक और पेशेवर दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकता है, जिससे महिलाओं के रोजगार के अवसर प्रभावित होने की आशंका है।
यह याचिका महिलाओं कर्मचारियों और छात्राओं के लिए देशभर में मासिक धर्म अवकाश नीति लागू करने की मांग को लेकर दायर की गई थी। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस तरह की अनिवार्य व्यवस्था अनजाने में लैंगिक रूढ़िवादिता को बढ़ावा दे सकती है और इससे नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बचने लग सकते हैं।
मामले की सुनवाई करते हुए पीठ में शामिल सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची ने कहा कि मासिक धर्म को किसी कमजोरी या हीनता के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया गया तो इससे यह धारणा बन सकती है कि महिलाओं को अतिरिक्त छुट्टियां मिलेंगी, जिसके चलते कुछ नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लगेंगे।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर नीति बनाने की संभावना पूरी तरह से समाप्त नहीं होती। न्यायालय ने कहा कि संबंधित सक्षम प्राधिकारी इस मुद्दे पर दिए गए प्रतिनिधित्व पर विचार कर सकते हैं और सभी हितधारकों से परामर्श कर इस दिशा में उचित निर्णय ले सकते हैं।
यह जनहित याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई थी, जिसमें देशभर की छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश को लेकर एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम आर शमशाद ने अदालत को बताया कि देश के कुछ राज्यों और संस्थानों ने इस दिशा में पहल की है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि केरला में कुछ शैक्षणिक संस्थानों ने छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान राहत देने की व्यवस्था शुरू की है, वहीं कई निजी कंपनियां भी अपने स्तर पर कर्मचारियों को स्वैच्छिक रूप से ऐसी छुट्टी प्रदान कर रही हैं।
इस पर अदालत ने कहा कि स्वैच्छिक तौर पर दी जाने वाली ऐसी सुविधाएं स्वागत योग्य हैं, लेकिन यदि इसे कानून के माध्यम से अनिवार्य बना दिया जाता है तो इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही इस विषय पर संबंधित अधिकारियों को प्रतिनिधित्व दे चुके हैं, इसलिए बार-बार अदालत से आदेश की मांग करना उचित नहीं है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित प्राधिकारियों को इस विषय पर प्रस्तुत प्रतिनिधित्व पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

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