करो तपस्या भारत के साधू संत,
फिर आ रही देश में बारूद गंध |
बच्चे बूढ़े मर मर जाये,
आसमान में उड़ते डरके साय |
कहीं मिसाइलों की आवाज गूंजती,
कहीं शहर खामोशी में समाय |
गली शहर में रार ये बढ़ती जाए,
कहीं बुद्ध के देश में युद्व न बढ़ता आए |
पड़ा है कच्चा भारत के घर में मक्के की रोटी सरसों का साग,
धड़क रही दुनिया के कोने कोने में युद्ध की आग |
मासूम जनता पीरी हुई है,
इंसानियत सवालों से घिरी हुई है।
राजनीति की शतरंज पर बैठे लोग,
लाभ लालच के खातिर नेता लाशों का करते हैं भोग।
विनाश कारी महाभारत की युद्ध कला फ़सी हुई है,
द्रोपदी सी दुनिया की जनता हर चाल में पिसी हुई है।
इधर भारत की गलियों में देखो हाल,
रासो पड़ा खाली सिलेंडर मां की गोद में भूखा लाल।
रसोई की आज हमें डराती है,
भ्रष्टाचारी महंगाई हमे सताती है।
खाली गैस सिलेंडर की नसों में सांस न आती है ,
भारत के हर घर मां को ये चिंता सताती है।
पेट्रोल पंप की लंबी कतारों में,
उम्मीदे भी धीरे-धीरे जलती है।
कीमत बढ़ती जाति हर सुबह,
और जेबें चुपचाप मचती है।
युद्ध कहीं दूर असर यहां तक छाई है,
महंगाई की लपेटे घर घर तक आई है।
दुनिया लड़ रही है ताकत के लिए,
जनता लड़ रही है रोजी-रोटी के लिए।
काश कभी ऐसा भी सवेरा आए ,
जहां युद्ध न युद्व हो, न ही महंगाई का डर सताए।
जहां पेट्रोल पंप पर तेल भरे सुकून मिले,
हर घर की की रसोई में खाना भरपूर मिले ।
(कवि:महेंद्र सिंह)


