- शरद कटियार
आज का युवा डिजिटल दौर में जी रहा है, लेकिन विडंबना यह है कि उसकी सोच का एक हिस्सा अब भी सदियों पुराने जातिगत खांचों में कैद है। सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति का जाति के आधार पर महिमामंडन करना, बिना यह सोचे कि उसने वास्तव में समाज के लिए क्या किया—यह प्रवृत्ति नई पीढ़ी को एक ऐसे मानसिक जाल में फंसा रही है, जहां समय, ऊर्जा और विवेक तीनों व्यर्थ हो रहे हैं।
सवाल यह है कि जिन व्यक्तियों का नाम लेकर युवा दिन-रात बहस करते हैं, क्या उन्होंने अपने परिवार और सीमित दायरे से आगे बढ़कर अपनी जाति या व्यापक समाज के उत्थान के लिए ठोस काम किया? या फिर यह केवल भावनात्मक उकसावे की राजनीति है?
मनोविज्ञान बताता है कि मनुष्य का मस्तिष्क “इन-ग्रुप बनाम आउट-ग्रुप” की प्रवृत्ति से काम करता है। सोशल आइडेंटिटी थ्योरी के अनुसार व्यक्ति अपनी पहचान को मजबूत करने के लिए किसी समूह से जुड़ाव महसूस करता है। जब यह जुड़ाव जाति जैसे स्थायी सामाजिक ढांचे से होता है, तो व्यक्ति तर्क से अधिक भावना पर चलने लगता है।
न्यूरोसाइंस के अनुसार बार-बार एक ही प्रकार की विचारधारा सुनना मस्तिष्क में स्थायी न्यूरल पाथवे बना देता है। यानी अगर युवा लगातार जातिवादी कंटेंट देखते-सुनते हैं, तो उनका दिमाग उसी दिशा में सोचने का अभ्यस्त हो जाता है। यह “कन्फर्मेशन बायस” को जन्म देता है जहां व्यक्ति केवल वही जानकारी स्वीकार करता है जो उसकी जातिगत सोच को मजबूत करता है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का मूल संदेश है—“अहं ब्रह्मास्मि” और “वसुधैव कुटुम्बकम्।” आत्मा न जन्म से बंधी है, न जाति से। गीता में कर्म को प्रधानता दी गई है, जन्म को नहीं।
संत कबीर, गुरु नानक और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों ने स्पष्ट कहा कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म और चरित्र से होती है। जब युवा जातिगत श्रेष्ठता के भ्रम में पड़ते हैं, तो वे आध्यात्मिक विकास से दूर हो जाते हैं।
आध्यात्मिकता हमें जोड़ती है, जातिवाद बांटता है।
जातिवाद केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सामाजिक संरचना है जो पीढ़ियों तक विभाजन पैदा करती है।शिक्षा और रोजगार में अवसरों की असमानता बढ़ती है।
सामाजिक सौहार्द कमजोर होता है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण गहराता है।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि जब युवा अपनी ऊर्जा जातिगत बहसों में खर्च करते हैं, तो वे नवाचार, कौशल विकास और उद्यमिता से दूर हो जाते हैं। इससे व्यक्तिगत और सामूहिक विकास दोनों बाधित होते हैं। असली सवाल ये है कि जिस व्यक्ति का गुणगान आप जाति के नाम पर कर रहे हैं क्या उसने शिक्षा संस्थान खोले?
क्या उसने बेरोजगार युवाओं के लिए अवसर पैदा किए?
क्या उसने सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया?यदि नहीं, तो केवल जातिगत पहचान के आधार पर अंध समर्थन किस काम का?
जातिवाद एक ऐसा जहर है जो धीरे-धीरे पीढ़ियों को प्रभावित करता है। इससे मिलता कुछ नहीं, खोता बहुत कुछ है—समय, प्रतिभा और सामाजिक एकता।
नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि असली पहचान जाति नहीं, कौशल, चरित्र और कर्म है। जब युवा अपनी ऊर्जा सकारात्मक निर्माण में लगाएंगे, तभी समाज आगे बढ़ेगा।
आज जरूरत है वैज्ञानिक विवेक, आध्यात्मिक समरसता और सामाजिक जिम्मेदारी की—ताकि आने वाली पीढ़ियां विभाजन नहीं, विकास की विरासत पाएं।



