अनीता द्विवेदी
आज के दौर में धर्म की परिभाषाएँ बहसों, प्रवचनों और राजनीति के शोर में उलझ गई हैं। कोई धर्म को कर्मकांड से जोड़ता है, कोई वेशभूषा से, तो कोई पहचान और प्रभुत्व से। लेकिन यदि हम गहराई में उतरें, तो धर्म की सबसे सरल और सबसे सशक्त व्याख्या यही है—हमारी वजह से किसी भी आत्मा को दुःख न पहुँचे।
धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ, व्रत-उपवास या मंदिर-मस्जिद जाना नहीं है। धर्म का मूल तत्व है करुणा, संवेदना और संयम। यदि हमारे शब्द, हमारे व्यवहार और हमारे निर्णय किसी को आहत कर रहे हैं, तो चाहे हम कितने भी धार्मिक अनुष्ठान क्यों न कर लें, वह सच्चा धर्म नहीं हो सकता।
अक्सर हम अपने अहंकार को धर्म का नाम दे देते हैं। “मैं सही हूँ” की जिद में हम दूसरों की भावनाओं को कुचल देते हैं। परिवारों में टूटन, समाज में विभाजन और रिश्तों में कड़वाहट का बड़ा कारण यही है कि हम धर्म को आचरण नहीं, तर्क और तकरार बना देते हैं।
सच्चा धर्म विनम्र बनाता है, कठोर नहीं। वह जोड़ता है, तोड़ता नहीं।
शब्द भी कर्म हैं
कई बार हम सोचते हैं कि हमने किसी को हाथ नहीं लगाया, इसलिए हमने कोई पाप नहीं किया। लेकिन कटु शब्द, अपमान और तिरस्कार भी उतना ही गहरा घाव दे सकते हैं। धर्म का पालन वहीं से शुरू होता है, जहाँ हम बोलने से पहले सोचते हैं—“क्या मेरे शब्द किसी को दुःख देंगे?”
यदि कोई भूखा है और हम उसे भोजन करा दें, यदि कोई निराश है और हम उसे आशा दे दें, यदि कोई गिरा हुआ है और हम उसे उठने का सहारा दे दें—तो यही सबसे बड़ा यज्ञ है। धर्म का सार कर्म में है, दिखावे में नहीं।
जब हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आती है, तब समझिए हमने धर्म का पालन किया।
धर्म का सामाजिक आयाम
समाज में असमानता, अन्याय और शोषण तब पनपते हैं जब धर्म को केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित कर दिया जाता है। सच्चा धर्म हमें अन्याय के खिलाफ खड़ा होना भी सिखाता है। यदि हमारी चुप्पी से किसी निर्दोष को कष्ट मिल रहा है, तो वह भी अधर्म है।
धर्म केवल यह नहीं कि हम किसी को दुःख न दें, बल्कि यह भी कि जहाँ दुःख हो, वहाँ हम राहत का कारण बनें।
आज की युवा पीढ़ी सवाल पूछती है, तर्क करती है और सत्य को समझना चाहती है। यह अच्छी बात है। उन्हें धर्म को भय या दबाव से नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों से जोड़कर समझाना होगा।
जब युवा यह समझ जाएंगे कि धर्म का अर्थ है—सम्मान, समानता और सह-अस्तित्व—तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन आएगा।
धर्म कोई जटिल दर्शन नहीं है जिसे केवल ग्रंथों में खोजा जाए। वह तो हमारे दैनिक व्यवहार में छिपा है।
जब हम ईमानदारी से यह प्रयास करते हैं कि हमारी वजह से किसी भी जीव को पीड़ा न हो, तब हम सच्चे अर्थों में धार्मिक बनते हैं।
धर्म की सबसे सरल परिभाषा यही है हम स्वयं प्रकाश बनें, किसी के जीवन में अंधकार नहीं।
धर्म की सबसे सरल व्याख्या: किसी भी आत्मा को हमारी वजह से दुःख न पहुँचे


