साक्षी महाराज के कथन से ‘भूसूर’ समाज में रोष, तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर
लखनऊ/नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में बयानबाज़ी का तापमान एक बार फिर बढ़ गया है। भाजपा सांसद डॉ. सच्चिदानंद हरि साक्षी महाराज, जिन्हें आचार्य महामंडलेश्वर के रूप में भी जाना जाता है, के हालिया “90 बनाम 10” बयान ने सामाजिक और धार्मिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है। उनके कथन को लेकर ‘धरती के भगवान’ कहे जाने वाले भूसूर समाज के प्रतिनिधियों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।
साक्षी महाराज ने एक सार्वजनिक मंच से “90 बनाम 10” के संदर्भ में बहुसंख्यक–अल्पसंख्यक समीकरण पर टिप्पणी की। हालांकि उन्होंने इसे सामाजिक संतुलन और राजनीतिक वास्तविकता की भाषा बताया, लेकिन विरोधियों ने इसे विभाजनकारी और उत्तेजक करार दिया।
ब्राह्मण समाज के कई संगठनों ने बयान को “अनुचित और असंतुलित” बताते हुए कहा कि समाज को प्रतिशतों में बांटने की प्रवृत्ति सामाजिक सौहार्द के विरुद्ध है। कुछ संगठनों ने यह भी कहा कि धार्मिक पद पर आसीन व्यक्ति से अपेक्षा संयमित और समावेशी भाषा की होती है।
एक प्रमुख ब्राह्मण संगठन के पदाधिकारी ने कटाक्ष करते हुए कहा—
“जब संत भी आंकड़ों की राजनीति करने लगें, तो फिर राजनेताओं से क्या अपेक्षा की जाए?”
विपक्षी दलों ने इस बयान को चुनावी रणनीति का हिस्सा बताते हुए भाजपा पर सामाजिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया। एक विपक्षी नेता ने कहा—
“देश विकास की बात चाहता है, प्रतिशत की नहीं।”
भाजपा के कुछ नेताओं ने साक्षी महाराज के बयान का बचाव करते हुए कहा कि उनके कथन को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया है। पार्टी के सूत्रों के अनुसार, उनका आशय सामाजिक एकता और राष्ट्रीय हित से था, न कि विभाजन से।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दे सकते हैं, लेकिन दीर्घकाल में सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे सामाजिक रूप से विविध राज्य में इस तरह की टिप्पणी तुरंत भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है।
“90 बनाम 10” का यह कथन सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि राजनीति और धर्म के संगम पर खड़ी संवेदनशीलता की परीक्षा है। सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक जीवन में बैठे व्यक्तियों को शब्दों की मर्यादा का अधिक ध्यान नहीं रखना चाहिए?
फिलहाल, साक्षी महाराज के बयान ने बहस की आग को हवा दे दी है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि यह विवाद सियासी गलियारों तक सीमित रहता है या सामाजिक संवाद की दिशा बदलता है।






