– बुंदेलखंड में पीएम मोदी के सपनों की अपनों ने ही निकाली हवा
– गुणवत्ता दरकिनार, करोड़ों की योजना में बड़े घोटालों की गंध
बुंदेलखंड | यूथ इंडिया
उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन (हर घर जल योजना) बुंदेलखंड क्षेत्र में ज़मीनी स्तर पर बुरी तरह विफल होती नज़र आ रही है। जिस योजना के माध्यम से प्रत्येक ग्रामीण परिवार को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था, वही योजना भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस ड्रीम परियोजना को बुंदेलखंड जैसे जल संकटग्रस्त क्षेत्र में जीवन रेखा माना जा रहा था, लेकिन स्थानीय स्तर पर अफसर–ठेकेदार गठजोड़ ने इस योजना को काग़ज़ी उपलब्धि बनाकर छोड़ दिया है।
योजना के तहत भले ही गांव-गांव नल कनेक्शन दिखा दिए गए हों, लेकिन आज भी बुंदेलखंड के कई इलाकों में महिलाओं और बेटियों को सिर पर पानी ढोने को मजबूर होना पड़ रहा है। कई गांवों में सुबह होते ही महिलाएं किलोमीटरों दूर हैंडपंप, कुएं या अस्थायी जल स्रोतों की ओर निकल पड़ती हैं।
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि नल तो घर में लगा है, लेकिन उसमें महीनों से पानी नहीं आया। मजबूरी में बेटियों की पढ़ाई और महिलाओं की दिनचर्या पर सीधा असर पड़ रहा है। यह स्थिति सरकार के “हर घर नल, हर घर जल” के दावे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार बुंदेलखंड के झांसी, ललितपुर, जालौन, महोबा, बांदा, चित्रकूट और हमीरपुर जिलों में हर घर जल योजना के तहत ₹18 हजार करोड़ से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की गईं। विभागीय रिपोर्टों में 90 प्रतिशत से अधिक घरों में नल कनेक्शन दर्शाए गए हैं।
हालांकि ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। कई गांवों में नलों से महीनों से पानी नहीं आया है, कहीं पाइप लाइन टूटी पड़ी है तो कहीं टंकियां तो बन गईं लेकिन जलापूर्ति शुरू ही नहीं हुई। स्थानीय स्तर पर किए गए सत्यापन में 40 से 50 प्रतिशत घरों में नियमित जल आपूर्ति नहीं होने की बात सामने आ रही है।
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने योजना के क्रियान्वयन में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। आरोप है कि मानक गुणवत्ता की पाइपों के बजाय सस्ती और कमजोर सामग्री का उपयोग हुआ।
जल टंकियों और पंप हाउस का तकनीकी परीक्षण किए बिना पूर्ण घोषित हुए।
कई स्थानों पर अधूरी परियोजनाओं का भी पूरा भुगतान हों गया।
ग्रामीणों का कहना है कि “नल दिखा देना ही काम पूरा मान लिया गया।”सूत्रों के मुताबिक योजना से संबंधित आंतरिक ऑडिट और शिकायतों में करोड़ों रुपये की गड़बड़ी सामने आई, लेकिन प्रभावशाली अधिकारियों और ठेकेदारों के कारण इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जिन अधिकारियों को गुणवत्ता और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्हीं पर लापरवाही के आरोप हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल आपूर्ति की विफलता केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या बन चुकी है। पानी ढोने की जिम्मेदारी आज भी महिलाओं पर ही है, जिससे उनका स्वास्थ्य, सुरक्षा और बेटियों की शिक्षा प्रभावित हो रही है।सवाल उठ रहे,
क्या प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना को स्थानीय तंत्र ने लूट का जरिया बना लिया?क्या उत्तर प्रदेश सरकार की निगरानी सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित है?जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
हर घर जल योजना का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को पानी ढोने की मजबूरी से मुक्ति दिलाना था, लेकिन बुंदेलखंड में हालात इसके उलट हैं। नल लगे हैं, पर पानी नहीं। महिलाएं और बेटियां आज भी सिर पर पानी ढोने को मजबूर हैं। अब जरूरत है कि योजना की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि योजना का लाभ काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर दिखे।





