व्यवस्था पर पुनर्विचार की ज़रूरत
उत्तर प्रदेश में व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस जांच को लेकर लिया गया हालिया निर्णय प्रशासनिक सुधार से अधिक व्यवहारिक चुनौती बनता दिख रहा है। मैनुअल फिटनेस जांच को पूरी तरह समाप्त कर केवल निजी ऑटोमेटेड टेस्टिंग सेंटर (एटीएस) के माध्यम से 23 लाख से अधिक वाहनों की जांच अनिवार्य कर देना—कागज़ पर भले ही पारदर्शिता और मानकीकरण का वादा करता हो—लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है।
सरकार का तर्क है कि ऑटोमेटेड प्रणाली से मानवीय हस्तक्षेप घटेगा, भ्रष्टाचार रुकेगा और जांच निष्पक्ष होगी। यह तर्क सैद्धांतिक रूप से मजबूत है, पर सवाल यह है कि क्या ढांचा तैयार है? प्रदेश के 75 जिलों के लिए केवल 13 निजी एटीएस—यह आंकड़ा ही व्यवस्था की सीमा उजागर कर देता है। सीमित केंद्रों के कारण वाहन मालिकों और चालकों को अपने ही जिले में फिटनेस कराने की सुविधा नहीं मिल पा रही है। उदाहरण के तौर पर लखनऊ का एटीएस कई पड़ोसी जिलों का भार उठा रहा है, जिससे लंबी कतारें, स्लॉट की कमी और अतिरिक्त खर्च स्वाभाविक हैं।
यह बदलाव केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुरूप किया गया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने नवंबर 2024 और अप्रैल 2025 में स्पष्ट निर्देश देकर राज्यों को एटीएस आधारित फिटनेस लागू करने को कहा था। निर्देशों का पालन करना राज्यों की जिम्मेदारी है, लेकिन नीतिगत आदेश और जमीनी तैयारी के बीच की दूरी भी उतनी ही अहम है। बिना पर्याप्त एटीएस, बिना सुचारु स्लॉट मैनेजमेंट और बिना परिवहन सहायता के यह बदलाव बोझ बन सकता है।
वाहन संगठनों की चिंता निराधार नहीं है। ग्रामीण और छोटे जिलों के वाहन चालक पहले से ही सीमित संसाधनों में काम करते हैं। लंबी दूरी तय कर फिटनेस कराना—वह भी बार-बार—ईंधन, समय और आय तीनों पर सीधा असर डालता है। इसके अलावा निजी एटीएस होने के कारण शुल्क संरचना और सेवा गुणवत्ता पर निगरानी भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यह भी विचारणीय है कि सुधार का उद्देश्य सुविधा के साथ अनुशासन होना चाहिए, न कि केवल तकनीक का प्रदर्शन। यदि एटीएस की संख्या बढ़ाए बिना, मोबाइल एटीएस या चरणबद्ध संक्रमण (हाइब्रिड मॉडल) अपनाए बिना मैनुअल व्यवस्था को एक झटके में बंद कर दिया जाता है, तो सुधार की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
फिटनेस जांच को पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाना सही दिशा है, लेकिन अधूरी तैयारी के साथ लागू की गई नीति जनता के लिए परेशानी का कारण बनती है। सरकार को चाहिए कि एटीएस की संख्या तेजी से बढ़ाए, स्लॉट प्रणाली को पारदर्शी बनाए, शुल्क पर नियंत्रण रखे और दूर-दराज़ के जिलों के लिए अस्थायी राहत मॉडल लागू करे।
तकनीक तभी सार्थक है, जब वह सुविधा बढ़ाए—दूरी नहीं।

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