परिकल्पना एवं संपादन: मोहम्मद आकिब खां
प्रस्तुति: यूथ इंडिया
फर्रुखाबाद की माटी ने न केवल राजा-महाराजाओं, सूफियों और स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के गगन में ऐसे ध्रुवतारे भी दिए, जिनकी चमक आज भी अक्षुण्ण है। जब हम ‘पाँचाल से फर्रुखाबाद’ की सांस्कृतिक यात्रा के पांचवें पड़ाव पर पहुँचते हैं, तो गंगा-रामगंगा के दोआब से उठती सुरों और तालों की वह गूँज सुनाई देती है, जिसने संपूर्ण विश्व में भारतीय संगीत का परचम फहराया। इस अंक में हम फर्रुखाबाद के संगीत जगत के दो ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्रों के सांगीतिक अवदान की चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने गायन और वादन दोनों ही विधाओं में इतिहास रचा—ठुमरी सम्राट ‘ललन पिया’ और फर्रुखाबाद तबला घराने के संस्थापक उस्ताद हाजी विलायत अली खाँ।
19वीं सदी के उत्तरार्ध में फर्रुखाबाद में जन्मे पंडित नंदलाल शर्मा, जिन्हें संगीत जगत अत्यंत आदर और प्रेम से ‘ललन पिया’ के नाम से जानता है, ठुमरी गायकी के इतिहास में एक मील का पत्थर हैं। ललन पिया ने ठुमरी को केवल भाव-प्रदर्शन का माध्यम न बनाकर उसे द्रुत लय और कठिन लयकारी के साथ ‘बंदिश’ में पिरोया। उनकी ठुमरियों में इतनी सूक्ष्म और पेचीदा बंदिशें होती थीं कि उनके साथ संगति करने वाले बड़े से बड़े तबला वादक के लिए ‘सम’ को पकड़ना एक बड़ी परीक्षा बन जाती थी। ललन पिया केवल एक गायक ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के गीतकार और रचनाकार भी थे। उन्होंने ‘ओष्ठबंदा’ जैसी अनूठी काव्य पद्धतियों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया, जिसमें होंठों का परस्पर स्पर्श नहीं होता। ‘ललन सुधाकर’, ‘ललन फाग’, और ‘ललन विनोद’ जैसी उनकी कृतियों ने संगीत शास्त्रियों को चकित कर दिया था और उनकी रची ठुमरियों की मिठास आज भी अवध और बनारस के घरानों में बड़े चाव से गाई जाती है।
जिस प्रकार गायकी में ललन पिया ने फर्रुखाबाद का नाम रोशन किया, उसी प्रकार वाद्य संगीत के क्षेत्र में उस्ताद हाजी विलायत अली खाँ ने तबला वादन की एक नई शैली को जन्म देकर ‘फर्रुखाबाद घराने’ की नींव रखी। लखनऊ घराने के प्रसिद्ध उस्ताद मियाँ बक्शू खाँ के शिष्य और दामाद, हाजी विलायत अली खाँ ने लखनऊ की शैली से सीख लेते हुए उसमें अपनी अद्वितीय कल्पनाशीलता और क्षेत्रीय लयकारियों का समावेश किया, जिससे 19वीं शताब्दी में फर्रुखाबाद तबला घराने का उदय हुआ। फर्रुखाबाद घराने के तबला वादन में निकास, मींड का प्रयोग, गन, पेशकार और पेचीदा ‘गत’ रचनाओं की प्रधानता होती है। खाँ साहब द्वारा रचित ‘गत’ और ‘परन’ आज भी विश्व भर के तबला वादकों के लिए एक मानक माने जाते हैं। हाजी विलायत अली खाँ की इस धरोहर को आगे चलकर उनके वंशज उस्ताद मसीत खाँ, उस्ताद अहमद जान थिरकवा, और पंडित ज्ञान प्रकाश घोष जैसे दिग्गजों ने पूरे विश्व में स्थापित किया।
फर्रुखाबाद की यह सांगीतिक परंपरा केवल शास्त्रीय नियमों का ढांचा भर नहीं है, बल्कि यह हमारी साझा ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का सबसे सुंदर उदाहरण है। एक तरफ जहाँ पंडित नंदलाल शर्मा यानी ललन पिया की ठुमरी में भक्ति, प्रेम और श्रृंगार का अनूठा संगम था, वहीं दूसरी तरफ उस्ताद हाजी विलायत अली खाँ के तबले की थाप ने उस संगीत को संपूर्णता प्रदान की। दोनों महान फ़नकारों ने बिना किसी भेदभाव के कला को ही अपना ईश्वर और धर्म माना, जिसने फर्रुखाबाद को भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक विशिष्ट और सम्मानित स्थान दिलाया।


