
– संस्कृति और संस्कार बचाने की जिम्मेदारी परिवार से शुरू होती है
कुर्मी सौरभ भानु कटियार
आज के समय में समाज किस दिशा में जा रहा है, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। आधुनिक तकनीक ने हमारी जिंदगी को आसान बनाया है, लेकिन इसके दुरुपयोग ने नई पीढ़ी के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच अश्लीलता, आपत्तिजनक तस्वीरों और वीडियो का प्रसार चिंता का विषय बनता जा रहा है। कुछ लोग लाइक, कमेंट, फॉलोअर्स और पैसे की चाह में ऐसा कंटेंट तैयार कर रहे हैं, जिसका बच्चों और किशोरों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप, यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आज बच्चों और युवाओं की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। समस्या सोशल मीडिया के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित और गलत इस्तेमाल में है। बच्चे जो देखते हैं, कई बार उसी को सही मानकर व्यवहार में उतारने लगते हैं। इसलिए अभिभावकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें और उन्हें सही-गलत का अंतर समझाएं।
आज सबसे बड़ी जरूरत बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर करने की नहीं, बल्कि मोबाइल और सोशल मीडिया के संतुलित उपयोग की है। ऑनलाइन पढ़ाई या जरूरी शैक्षणिक गतिविधियों के लिए मोबाइल और इंटरनेट आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम और उनके द्वारा देखी जा रही सामग्री पर ध्यान दें।
बच्चों को केवल मोबाइल देकर अपने काम में व्यस्त हो जाना भविष्य में बड़ी समस्या का कारण बन सकता है। अक्सर छोटे बच्चे जब रोते या जिद करते हैं तो उन्हें चुप कराने के लिए माता-पिता मोबाइल पकड़ा देते हैं। धीरे-धीरे बच्चा मोबाइल का आदी होने लगता है। आगे चलकर वही आदत जिद, चिड़चिड़ापन और अनुशासनहीनता का रूप ले सकती है। बच्चा मोबाइल न मिलने पर नाराज होने लगता है और कई बार बड़ों से भी अनुचित भाषा में बात करने लगता है।
बच्चे खाली जगह में संस्कार नहीं सीखते, वे अपने आसपास के वातावरण से सीखते हैं। इसलिए माता-पिता को बच्चों को समय देना होगा। उनके साथ बैठकर बातचीत करनी होगी, उनकी बातें सुननी होंगी और उन्हें परिवार, समाज, संस्कृति तथा भारतीय संस्कारों से जोड़ना होगा।
बच्चों को यह समझाना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चीज वास्तविक या सही नहीं होती। लोकप्रिय होना जीवन की सफलता नहीं है और लाइक-कमेंट की संख्या किसी व्यक्ति के चरित्र का प्रमाण नहीं है। बच्चों को अच्छे साहित्य, खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियों और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
आज अगर परिवार ने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो आने वाली पीढ़ी तकनीक में तो आगे निकल जाएगी, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि वह अपनी संस्कृति और संस्कारों से दूर हो जाए। इसलिए बच्चों के हाथ में मोबाइल देने से पहले उन्हें संस्कार देना जरूरी है।
बच्चों का भविष्य केवल स्कूल और किताबों से नहीं, बल्कि परिवार के व्यवहार और वातावरण से भी बनता है। आज माता-पिता बच्चों को जितना समय, प्यार और संस्कार देंगे, कल वही बच्चे समाज और देश का बेहतर भविष्य बनाएंगे।


