नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 6 अक्टूबर को तमिलनाडु विधानसभा के 2003 के उस विवाद से जुड़े करीब 22-23 साल पुराने मामले को निष्फल मानते हुए बंद कर दिया, जिसमें विधानसभा के विशेषाधिकार और नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन का महत्वपूर्ण सवाल उठा था। सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने हालांकि इस मामले से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को भविष्य में उचित मामले में तय किए जाने के लिए खुला छोड़ दिया है।
पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश डीवाई नहीं, बल्कि सीजेआई सूर्यकांत ने की। उनके साथ न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली, न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे।
मामले की शुरुआत वर्ष 2003 में तमिलनाडु विधानसभा की कार्रवाई से हुई थी। उस समय द हिन्दू ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता और उनकी सरकार की आलोचना करते हुए संपादकीय प्रकाशित किया था। विधानसभा ने अखबार की रिपोर्टिंग और संपादकीय को सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन माना।
7 नवंबर 2003 को विधानसभा ने तत्कालीन संपादक एन. रवि, कार्यकारी संपादक मालिनी पार्थसारथी, ब्यूरो प्रमुख वी. जयंथ, विशेष संवाददाता राधा वेंकटेशन और प्रकाशक एस. रंगराजन सहित पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें 15 दिन के साधारण कारावास की सजा देने का प्रस्ताव पारित किया था।
इसके बाद पत्रकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2003 में गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। मामले में यह बड़ा संवैधानिक सवाल उठा कि क्या विधानसभा का विशेषाधिकार संविधान के अनुच्छेद 194 के तहत प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, यानी अनुच्छेद 19(1)(a), पर प्रभाव डाल सकता है?
मामले में पहले दो और फिर पांच न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई की। पुराने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों में विधायी विशेषाधिकार और मौलिक अधिकारों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आने के कारण मामला अंततः सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजा गया।
लेकिन इस बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो चुका था। तमिलनाडु विधानसभा ने 2004 में ही 2003 के विवादित प्रस्ताव को वापस ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट के मंगलवार के आदेश में कहा गया कि यह महत्वपूर्ण तथ्य उस समय अदालत के संज्ञान में नहीं आ पाया, जब मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा गया था।
सात जजों की पीठ ने माना कि जिस विधानसभा प्रस्ताव से विवाद पैदा हुआ था, वह पहले ही वापस लिया जा चुका है। इसलिए वर्तमान मामले में अब कोई जीवित विवाद नहीं बचा है। इसी आधार पर याचिकाओं को निष्फल मानते हुए बंद कर दिया गया।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधायी विशेषाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संबंध से जुड़े मूल कानूनी प्रश्नों का फैसला नहीं किया गया है। इन्हें भविष्य में किसी उचित और जीवित मामले में तय किया जा सकता है।
इस मामले की सुनवाई को लेकर एक दिलचस्प बात भी सामने आई। वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि अदालत ने संभवतः सात जजों की पीठ की सबसे छोटी सुनवाई और सबसे तेजी से निपटाए गए मामलों में एक रिकॉर्ड बनाया है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस बार संवैधानिक सवाल पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया, लेकिन मामला भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाता है,क्या विधायिका अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल ऐसे लोगों के खिलाफ कर सकती है जो सदन के सदस्य नहीं हैं और जिन्होंने सदन के बाहर अभिव्यक्ति की है?


