शरद कटियार
भोपाल। भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भोपाल में नए आपराधिक कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद एफआईआर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की प्रक्रिया तीन वर्ष के भीतर पूरी करने का लक्ष्य दोहराया है। यह दावा नया नहीं है; केंद्र सरकार 2024 में नए कानून लागू करते समय भी इसी समयबद्ध न्याय की बात कह चुकी है।
यहां सवाल केवल कानून बदलने का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या कानून की किताब में तय समयसीमा अदालत, पुलिस, अभियोजन और फोरेंसिक व्यवस्था की जमीन पर भी उतनी ही तेजी से दिखाई देगी?
1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस ), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस ) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए ) लागू किए गए। इन कानूनों ने क्रमशः भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का स्थान लिया। सरकार ने इनमें डिजिटल तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और फोरेंसिक जांच को अधिक महत्व देने की बात कही है।
लेकिन किसी कानून की सफलता केवल उसके प्रावधानों से तय नहीं होती। पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन हों, जांच समय पर पूरी हो, अभियोजन प्रभावी हो, फोरेंसिक रिपोर्ट समय से आए और अदालतों में मामलों का बोझ कम हो,तभी समयबद्ध न्याय का लक्ष्य वास्तविकता में बदल सकता है।
गृह मंत्रालय के अनुसार सरकार ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर काम कर रही है जिसमें एफआईआर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की पूरी न्यायिक प्रक्रिया तीन वर्ष के भीतर पूरी की जा सके। केंद्र ने इसके लिए नए कानूनों में समयसीमा, तकनीकी व्यवस्था और फोरेंसिक क्षमता बढ़ाने जैसे कदमों को महत्वपूर्ण बताया है। यानी संदेश साफ है,मुकदमे को अनिश्चितकाल तक खिंचने देने की मानसिकता बदलनी होगी।
लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी भी है। तीन साल का लक्ष्य हर मामले के वास्तविक निस्तारण की गारंटी के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। मुकदमे की प्रकृति, साक्ष्य, अपील और न्यायिक प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों का समय अलग हो सकता है।
नए कानूनों में जीरो एफआईआर, ई-एफआईआर, डिजिटल रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया है। सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में फोरेंसिक जांच को अनिवार्य बनाने की व्यवस्था भी बताई गई है। सरकार का तर्क है कि इससे जांच को वैज्ञानिक आधार मिलेगा और दोषसिद्धि की गुणवत्ता बेहतर होगी।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ उतना ही महत्वपूर्ण सवाल संसाधनों का है। यदि किसी गंभीर मामले में फोरेंसिक रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं होती या जांच एजेंसी पर अत्यधिक बोझ रहता है तो समयबद्ध न्याय की पूरी श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
न्याय मिलने में देरी केवल कानून की वजह से नहीं होती। पुलिस जांच, अभियोजन, गवाह, दस्तावेज, फोरेंसिक रिपोर्ट, अदालतों में लंबित मामले और अपील—ये सभी न्याय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इसलिए तीन साल का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब एफआईआर से लेकर अंतिम अपील तक पूरी प्रणाली एक-दूसरे से तालमेल के साथ चले।
गृह मंत्रालय ने भी नए कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन के लिए पुलिस, अभियोजन, न्यायपालिका और फोरेंसिक व्यवस्था को साथ लेकर चलने की आवश्यकता पर जोर दिया है। आम नागरिक के लिए न्याय व्यवस्था का मूल्य किसी भाषण या कानून की किताब में नहीं, बल्कि अदालत के फैसले तक पहुंचने में है। पीड़ित परिवार के लिए न्याय तब मायने रखता है जब वर्षों के इंतजार के बजाय मामले में समय पर कार्रवाई और निर्णय दिखाई दे।
अमित शाह का तीन साल का लक्ष्य इसी उम्मीद को संबोधित करता है। अब सरकार और न्याय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि समयबद्ध न्याय का यह लक्ष्य आंकड़ों, अदालतों और आम नागरिक के अनुभव में कितना दिखाई देता है।कानून बदलना पहला कदम है, व्यवस्था को बदलना असली परीक्षा।


