फर्रुखाबाद ब्यूरो दिनांक-28 सितम्बर 2026 को वामपंथी व जनवादी दलों के राष्ट्रव्यापी अभियान के अंतर्गत मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुये भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, आम आदमी पार्टी एवं समाजवादी पार्टी के साथियों ने मिलकर राष्ट्रपति महोदया को संबोधित 10 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन पारुल तरार सिटी मजिस्ट्रेट फर्रुखाबाद को सौंपा। ज्ञापन देने से पूर्व मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जिलामंत्री का0 सुनील कुमार कटियार ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने केंद्र सरकार के इशारे पर पूरे देश से 13 करोड़ मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर किया है जो बहुत बड़ी संख्या है, यह लोकतंत्र पर डाका है, जिन लोगों को वोट के अधिकार से वंचित किया है वह सरकारी सुविधाओं को प्राप्त करने से वंचित हो सकते हैं। जैसाकि बंगाल की मतदाता सूची में नाम न जुड़ पाने से दि टेलीग्राफ के संपादक का पासपोर्ट नवीनीकरण करने से रोक दिया गया।
ज्ञापन में कहा गया है कि इंडियन एक्सप्रेस (23 सितंबर) में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) को लेकर हुए चौंकाने वाले खुलासे न केवल इस प्रक्रिया पर, बल्कि इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण रूप से भारत के चुनाव आयोग (ECI) की ईमानदारी और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
इन खुलासों ने उन संदेहों और चिंताओं को और मज़बूत किया है जिन्हें CPI(M), अन्य विपक्षी दलों और नागरिक समाज के संगठनों ने SIR प्रक्रिया शुरू होने के समय से ही उठाया था।
रिपोर्टों से पता चलता है कि तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने वोटर लिस्ट में संशोधन और SIR प्रक्रिया से जुड़े कई फैसलों पर आपत्ति जताई है। कानून के अनुसार, तीनों चुनाव आयुक्त बराबर होते हैं और किसी भी मतभेद को बहुमत या सर्वसम्मति से सुलझाया जाना चाहिए। CEC ने इस नियम का पालन नहीं किया, बल्कि अपने साथी चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की परवाह किए बिना अपनी राय थोपते रहे। अहम बात यह है कि ये मतभेद इस बात से जुड़े बुनियादी सवालों पर हैं कि वोटर लिस्ट में वोटरों को कैसे जोड़ा या हटाया जा रहा है और SIR को कैसे लागू किया जा रहा है।
अब जो बात सामने आ रही है, वह यह है कि CEC ने लगातार गलत दावा किया है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और विकेंद्रीकृत (decentralised) है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि पिछले कुछ महीनों में पूरी व्यवस्था को इतना केंद्रीकृत कर दिया गया है कि यह पता ही नहीं चलता कि असल में फैसले कौन ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी टेक्नोलॉजी पर अत्यधिक निर्भरता और नोटिस जारी करने के “यांत्रिक” (mechanical) तरीके पर सवाल उठाए हैं।
दो चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए मुद्दे SIR प्रक्रिया से कहीं आगे के हैं। ये मुद्दे चुनाव आयोग की संस्थागत ईमानदारी और लोकतांत्रिक कामकाज, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, अत्यधिक केंद्रीकरण और सभी वयस्कों के वोट देने के अधिकार (यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइजी) की सुरक्षा से जुड़े हैं। एक निष्पक्ष संस्था के तौर पर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता दांव पर है। लोगों का भरोसा एक ऐसे चुनाव आयोग से उठ गया है जिसकी निष्पक्षता पर सवालिया निशान लग गया है, और इसके लिए CEC ज्ञानेश कुमार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। वे अब और अपने पद पर बने नहीं रह सकते।
तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने कम से कम 14 मौकों पर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा एसआईआर के संचालन से संबंधित फैसलों पर आपत्ति दर्ज की है। उन्होंने उनकी सहमति के बिना लिए जा रहे फैसलों को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई हैं।
यह रिपोर्ट विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों द्वारा पहले उठाई गई चिंताओं की पुष्टि करती है। इस खुलासे से एसआईआर और मतदाता सूचियों के प्रबंधन को पारदर्शी और विकेंद्रीकृत बताए जाने के दावों की वास्तविकता सामने आती है।
निर्वाचन आयोग पर मतदाता डेटाबेस को केंद्रीकृत करने और राज्य तथा निर्वाचन क्षेत्र स्तर के वैधानिक अधिकारियों की उस तक पहुंच सीमित करने का भी आरोप है। गोवा के उदाहरण से स्पष्ट है कि कथित तौर पर सॉफ्टवेयर संबंधी प्रतिबंधों के कारण निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को 97 मतदाताओं को पात्र पाए जाने संबंधी अपने फैसले दर्ज करने में कठिनाई हुई।
आज निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली तथा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के मूल लोकतांत्रिक सिद्धांत की रक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता बनी हुई है।
केंद्र द्वारा नियंत्रित प्रक्रियाएं चुनाव व्यवस्था में जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं और निर्वाचन आयोग ने अपनी विश्वसनीयता तथा स्वतंत्रता खो दी है। ज्ञानेश कुमार व्यवस्था में हेरफेर और संस्था में लोगों के विश्वास को कमजोर करने के लिए जवाबदेह हैं। इसके साथ ही राष्ट्रपति महोदया से मांग की गई है
1-ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेकर अपराधिक मुकदमा चलाया जाये।
2- चुनाव आयुक्तों के चयन में पहले की तरह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाये।
3- चुनाव आयोग की स्वायत्तता को बहाल कर उसके कामकाज को पारदर्शी बनाया जाये।
4- एसआईआर को तत्काल रोका जाये।
5- एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी तथा चंद व्यक्तियों द्वारा मतदाता सूची में मनमाने ढंग से नाम काटने व जोड़ने की गहन जांच कर मतदाता सूचियों को सही किया जाये तथा दोषियों को सजा दी जाये।
6- जिन राज्यों में एसआईआर की जटिल प्रक्रिया से जो लाखों मतदाता मतदान से वंचित रह गये हैं,मतदाता सूचियों में उनका नाम जोड़कर वहां दोबारा मतदान कराया जाये।
7- चुनाव प्रक्रिया में व्यापक सुधार कर आनुपातिक चुनाव प्रणाली से चुनाव कराये जाये।
8- समस्त चुनाव खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाये तथा राजनीतिक दलों द्वारा किये जाने वाले अनाप-शनाप खर्च पर रोक लगाई जाये। जिससे काला धन पर रोक लग सकेगी।
9- एक देश एक चुनाव न कराये जायें। इससे भारत के संघीय अधिकारों का हनन होगा।
10- इसके साथ ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पूर्व की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाये।
ज्ञापन देने वालों में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) से सुनील कुमार कटियार, रामकुमार,जगदीश चंद्र, बलवीर सिंह, नरवीर सिंह, हरिनंदन यादव, कुलदीप, अनुभव, विजेन्द्र सिंह,चन्द्रशेखर वर्मा एडवोकेट, किशोरी लाल वर्मा एडवोकेट तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से डा0 रक्षपाल सिंह, आम आदमी पार्टी से अंकुश सिंह चौहान एडवोकेट एवं समाजवादी पार्टी से सुभाषचंद्र शाक्य एडवोकेट तथा रजत क्रांतिकारी शामिल रहे।


