शरद कटियार
इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के चुनाव में महिला अधिवक्ताओं के प्रतिनिधित्व का सवाल एक बार फिर अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। अधिवक्ता कुमारी अपराजिता सिंह की ओर से दाखिल याचिका में बार एसोसिएशन के सभी पदों पर महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण की मांग की गई है। इस याचिका पर आज सुनवाई होनी है। सवाल केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि न्याय के क्षेत्र में सक्रिय आधी आबादी की संस्थागत भागीदारी का भी है।
गौर करने वाली बात यह है कि हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का चुनाव 17 सितंबर 2026 को हो चुका है। चुनाव में 30 पदों के लिए 263 प्रत्याशी मैदान में थे। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद उठी आरक्षण की मांग कई संवैधानिक और व्यावहारिक प्रश्न भी खड़े करती है। अदालत के सामने यह तय करना महत्वपूर्ण होगा कि महिला प्रतिनिधित्व का सिद्धांत किस स्तर पर और किस प्रक्रिया के माध्यम से लागू किया जाना चाहिए।
न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। बड़ी संख्या में महिला अधिवक्ता न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन सवाल यह है कि बार की निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व उस अनुपात में दिखाई देता है या नहीं। यदि महिला अधिवक्ताओं की संख्या और उनकी पेशेवर भूमिका लगातार बढ़ रही है तो बार एसोसिएशन की कार्यकारिणी में भी उनकी प्रभावी भागीदारी पर गंभीर विमर्श स्वाभाविक है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से बार एसोसिएशन की शासी एवं कार्यकारिणी संस्थाओं में महिलाओं के न्यूनतम 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व को लेकर दिए गए निर्देशों की पृष्ठभूमि में यह मामला और महत्वपूर्ण हो जाता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी एक अन्य बार एसोसिएशन के संदर्भ में भविष्य के चुनावों में महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए उपनियमों में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया जा चुका है।
हालांकि, आरक्षण लागू करने का तरीका उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका उद्देश्य। चुनाव हो जाने के बाद किसी व्यवस्था को लागू करने से वर्तमान निर्वाचन प्रक्रिया, निर्वाचित पदों और संस्थागत नियमों पर क्या प्रभाव पड़ेगा,इन सभी पहलुओं पर स्पष्ट न्यायिक दृष्टिकोण आवश्यक होगा। भविष्य के चुनावों के लिए नियमों में संशोधन करना हो या वर्तमान चुनाव से संबंधित कोई व्यवस्था करनी हो, दोनों के बीच स्पष्ट अंतर भी बनाए रखना होगा।
बार एसोसिएशन केवल अधिवक्ताओं का संगठन नहीं है। यह न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण संस्थागत हिस्सा है। इसलिए इसकी कार्यकारिणी में महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न व्यापक रूप से समान अवसर, प्रतिनिधित्व और संस्थागत लोकतंत्र से जुड़ा है।
अब निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट पर हैं। अदालत का निर्णय न केवल इस चुनाव से जुड़े विवाद की दिशा तय करेगा, बल्कि प्रदेश की अन्य बार एसोसिएशनों में महिला प्रतिनिधित्व के लिए भी एक महत्वपूर्ण दृष्टांत बन सकता है। जरूरत इस बात की है कि महिला अधिवक्ताओं की भागीदारी को केवल चुनावी आरक्षण के नजरिए से नहीं, बल्कि न्यायिक संस्थाओं में समान और प्रभावी प्रतिनिधित्व के व्यापक सवाल के रूप में देखा जाए।


